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Followup Special News

ज़िंदगी भर उठाए सत्ता के ज़ुल्मो-सितम पर नहीं टेके घुटने, ऐसे क्रांतिकारी शायर थे फ़ैज़

फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था।

कृषि कानून: किसानों के अहिंसक आंदोलन को समझने की कितनी जरूरत

कुछ ही दिन पहले हमलोग इस बहस से होकर गुजर रहे थे कि 1947 को मिली आजादी असली आजादी नहीं थी, क्योंकि अंग्रेजों ने हमें ताकत के बल पर गुलाम बनाया था और जाते वक्त उन्होंने हमें भीख में आजादी दे दी गयी। यह सिर्फ अभिनेत्री कंगना राणावत का तर्क नहीं था, देश का ए

कृषि कानून: उलटा पड़ता दिख रहा है बिल वापसी का दांव-संदर्भ चुनाव

'जब किसानों से पूछा गया कि अब तो खुश हैं, वापस जाएंगे या नहीं, तो किसानों ने प्रधानमंत्री मोदी पर अविश्वास जताते हुए कहा कि उनकी टीवी पर कही बातों पर हम यकीन नहीं करते।

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से जुड़ी ऐसी जानकारी जो कभी न सुनी, न पढ़ी होगी

रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं। तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया।

समाजवादी-ललक-8: मानव अधिकार के लिए हमेशा सजग और प्रतिबद्ध रहे लोहिया

संविधान में तो मूल अधिकारों के अमल की दुर्गति तथा पंचायती राज और राष्ट्रभाषा की अवधारणा का विलोप भी है। 

समाजवादी-ललक-7: संविधान के 'भारत के हम लोग' वाले मुखड़े के तेवर में लोहिया ने फूंकी सांस

गांधीवादी लेखक कनक तिवारी के माध्यम से लोहिया को समझने की कोशिश

समाजवादी-ललक-6: जर्मनी में डाॅक्टरेट की तैयारी करते समय लोहिया सोशल डेमोक्रैट बन गए थे

किशन पटनायक के साथ लोहिया के निकट रहे बुद्धिजीवी और अब देश के सबसे बुजुर्ग समाजवादी सच्चिदानंद सिन्हा

धरती आबा-2: आदिवासी बनाम जनजाति : दो अलग-अलग विचार का संघर्ष

जयपालसिंह मुंडा ने कहा था की- " हमें आदिवासी शब्द छोड़कर अन्य कोई दूसरा शब्द स्वीकार नहीं है।"

धरती आबा: भगवान बिरसा मुंडा की जन्मस्थली उलिहातू में एक ढंग का स्मारक तक नहीं

'इसी 15 नवंबर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातु गांव में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था।

Edit-desk: धरती आबा का अबुआ दिशोम, अबुआ राज- कितना हुआ साकार

उन्नीसवीं सदी के अंत में झारखंड के पहाड़ी इलाके में एक  क्रांतिकारी  युवा ने अपने राज का बिगुल फूंक  दिया था।

भारत-चीन जंग 1962: CIA, माओ और नेहरू की भूमिका की पड़ताल 

चाचा नेहरू" न सिर्फ जन्मदिन की वजह से हमारी स्मृति में हैं, कश्मीर भी है और 1962 का युद्ध भी

लाल-जवाहर-4: तब आज़ाद नगर होता इस्पात नगरी भिलाई का नाम, जानिए नेहरू का क्या था नज़रिया

मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू (जस्टिस मार्कंडेय काटजू के दादा) इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे थे

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