फ़ैज़ उन बड़े कवियों में हैं जिनकी चेतना ने राष्ट्र और राष्ट्रवाद का सही अर्थों में अतिक्रमण किया था और समूचे भारतीय उपमहाद्वीप के मजदूरों-किसानों और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कविता लिखने से लेकर जमीनी स्तर तक की वास्तव लड़ाईयों का नेतृत्व किया था।
कुछ ही दिन पहले हमलोग इस बहस से होकर गुजर रहे थे कि 1947 को मिली आजादी असली आजादी नहीं थी, क्योंकि अंग्रेजों ने हमें ताकत के बल पर गुलाम बनाया था और जाते वक्त उन्होंने हमें भीख में आजादी दे दी गयी। यह सिर्फ अभिनेत्री कंगना राणावत का तर्क नहीं था, देश का ए
'जब किसानों से पूछा गया कि अब तो खुश हैं, वापस जाएंगे या नहीं, तो किसानों ने प्रधानमंत्री मोदी पर अविश्वास जताते हुए कहा कि उनकी टीवी पर कही बातों पर हम यकीन नहीं करते।
रानी लक्ष्मीबाई शामियाने के एक कोने में एक पर्दे के पीछे बैठी हुई थीं। तभी अचानक रानी के दत्तक पुत्र दामोदर ने वो पर्दा हटा दिया।
संविधान में तो मूल अधिकारों के अमल की दुर्गति तथा पंचायती राज और राष्ट्रभाषा की अवधारणा का विलोप भी है।
गांधीवादी लेखक कनक तिवारी के माध्यम से लोहिया को समझने की कोशिश
किशन पटनायक के साथ लोहिया के निकट रहे बुद्धिजीवी और अब देश के सबसे बुजुर्ग समाजवादी सच्चिदानंद सिन्हा
जयपालसिंह मुंडा ने कहा था की- " हमें आदिवासी शब्द छोड़कर अन्य कोई दूसरा शब्द स्वीकार नहीं है।"
'इसी 15 नवंबर 1875 को खूंटी जिले के उलिहातु गांव में बिरसा मुंडा का जन्म हुआ था।
उन्नीसवीं सदी के अंत में झारखंड के पहाड़ी इलाके में एक क्रांतिकारी युवा ने अपने राज का बिगुल फूंक दिया था।
चाचा नेहरू" न सिर्फ जन्मदिन की वजह से हमारी स्मृति में हैं, कश्मीर भी है और 1962 का युद्ध भी
मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाश नाथ काटजू (जस्टिस मार्कंडेय काटजू के दादा) इस मुहिम का नेतृत्व कर रहे थे