द फॉलोअप टीम, डेस्क:
बीसवी शताब्दी का तीसरा दशक। एक 21-22 साल का लड़का सैनिक छावनी में बने मैदान में आधी रात को हॉकी का अभ्यास कर रहा था। गोलपोस्ट से टकराती बॉल की आवाज स्याह रात के सन्नाटे को चीर रही थी। लड़का पसीने से तर-बतर था। तभी वहां कोच पहुंचे। लड़के से पूछा। अरे ध्यान..तुम इतनी रात गये यहां क्या कर रहे हो। सोना नहीं है। लड़का बोला "कोच साहब दिन को समय नहीं मिलता। इसलिए रात को अभ्यास कर रहा हूं"। कोच लड़के की लगन देखकर प्रभावित हुये। कहा- "ध्यान एक दिन तुम विश्व में चांद की तरह चमकोगे। ये लड़का कोई और नहीं, हॉकी के जादूगर ध्यानचंद थे। कहते हैं कि इसी दिन सेना के इस जवान को नया नाम मिला था। ध्यानचंद।
मेजर ध्यानचंद। जिसके नाम हॉकी के तमाम रिकॉर्ड हैं। खेल की दुनिया में जिसका रूतबा इतना बड़ा है कि उनकी जन्मतिथि को भारत में राष्ट्रीय खेल दिवस के तौर पर मनाया जाता है। हम इस वीडियो में ध्यानचंद की कुछ अनकही दास्तां आपको सुनाएंगे।

न्यूजीलैंड था ध्यानचंद का पहला विदेशी दौरा
ध्यानचंद को पहली साल 1926 में विदेशी दौरे में जाने का मौका मिला था। वे टीम के साथ न्यूजीलैंड के दौरे पर पहुंचे। यहां टीम इंडिया ने कुल 21 मुकाबले खेले जिसमें से 18 मुकाबलों में जीत हासिल की। पूरे टूर्नामेंट में टीम इंडिया ने कुल 20 गोल दागे जिसमें अकेले ध्यानचंद ने आधे गोल दागे थे। न्यूजीलैंड दौरे में शानदार प्रदर्शन की बदौलत ध्यानचंद की ख्याति पूरी दुनिया में फैल गई। कहते हैं कि टीम इंडिया और ध्यानचंद के इस प्रदर्शन को देख एकबारगी ब्रिटेन की हॉकी टीम ने एम्सटर्डम ओलंपिक्स में हिस्सा लेने से मना कर दिया था। ये ध्यानचंद का पहला ओलंपिक था।

हिटलर ने दिया था फील्ड मार्शल बनने का प्रस्ताव
साल 1936 में भारतीय हॉकी टीम ओलंपिक में भाग लेने बर्लिन पहुंची। टीम में ध्यानचंद भी थे। एक मुकाबला जर्मनी के खिलाफ भी था। जर्मनी में उस समय तानाशाह हिटलर का शासन था। हिटलर किसी भी कीमत पर जीत चाहता था। उसके निर्देश पर मैदान को जरूरत से ज्यादा गीला कर दिया। हिटलर को उम्मीद थी कि सस्ता जूता पहने भारतीय खिलाड़ी यहां टिक नहीं पाएंगे। उसने सही ही सोचा था। टीम इंडिया हाफटाइम तक मुकाबले में 1-0 से पिछड़ रही थी। हॉफटाइम के बाद जब टीम इंडिया मैदान में उतरी तो वहां मौजूद लोग हैरान रह गये। खुद एडॉल्फ हिटलर भी। ध्यानचंद सहित टीम के कई खिलाड़ी नंगे पांव मैदान में थे। पासा पलट चुका था। जब मुकाबला खत्म हुआ तो टीम इंडिया, जर्मनी को 8-1 से रौंद चुकी थी। हिटलर भी ध्यानचंद से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। उसने पूरी भारतीय टीम को खाने पर बुलाया। वहां हिटलर ने ध्यानचंद से पूछा कि तुम क्या करते हो। ध्यानचंद ने बताया कि मैं भारतीय सेना में लांस लायक हूं। हिटलर ने ध्यानचंद से कहा कि यदि तुम हमारी साइड आ जाओ तो तुम्हें फील्ड मार्शल बना दिया जायेगा। ध्यानचंद ने विनम्रता से इंकार कर दिया। हिटलर अपना सा मुंह लेकर रह गया।

बचपन में पहलवान बनना चाहते थे मेजर ध्यानचंद
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद हॉकी का पूरा अध्याय हैं। 29 अगस्त 1905 को यूपी के इलाहाबाद में जन्मे ध्यानचंद को कुश्ती पसंद थी। वे रेसलर बनना चाहते थे। सेना में भर्ती होने के बाद ध्यानचंद ने चुश्ती और फुर्ती बनाए रखने के लिए हॉकी खेलना शुरू किया। कुछ समय बाद हॉकी उनका शौक बना और फिर जूनून। हॉकी के प्रति उनके जूनून का एक वाकया बताता हूं। ध्यानचंद पूरे दिन ड्यूटी में व्यस्त रहते थे। उनको अभ्यास का वक्त भी नहीं मिल पाता था। एक ऑप्शन था सूर्यास्त के बाद अभ्यास करने का लेकिन उस समय फ्लड लाइट की सुविधा नहीं होती थी। ऐसे में ध्यानचंद चांदनी रात का इंतजार किया करते। जब महीने के 15 दिन चांदनी रात होती तो ध्यानचंद उसकी रोशनी में अभ्यास करते। इसका जिक्र मैंने वीडियो की शुरुआत में भी किया था। ऐसा था ध्यानचंद का ध्यान।

कई बार तोड़कर देखी गई थी ध्यानचंद की हॉकी स्टिक
मेजर ध्यानचंद को हॉकी का जादूगर क्यों कहा जाता है। दरअसल, एकबार गेंद ध्यानचंद के पाले में आ जाती तो वे उसपर ऐसा कंट्रोल करते कि लगता गेंद स्टिक से चिपक गई हो। मैदान में कहीं भी ध्यानचंद को गेंद मिली हो, जाकर गोलपोस्ट पर ही रूकती थी। ऐसे में कई लोगों को भ्रम होता था कि ध्यानचंद कुछ गड़बड़ करते हैं। लगता था कि उन्होंने हॉकी स्टिक में चुंबक लगा रखी है। इस वजह से एक बार नीदरलैंड और एक बार जापान में ध्यानचंद की हॉकी स्टिक तोड़कर चेक की गई। उनको स्टिक में कुछ नहीं मिला। वे समझ गए थे कि जादू तो ध्यानचंद की हाथों में है।

तीन ओलंपिक खेलों का हिस्सा बने थे मेजर ध्यानचंद
ध्यानचंद ने तीन बार ओलंपिक में भाग लिया। एक बार टीम की कप्तानी भी की। ध्यानचंद 1928 में एम्सटर्डम ओलंपिक, 1932 में लॉस एंजिलिस ओलंपिक और 1936 में बर्लिन ओलंपिक्स में खेले। बर्लिन ओलंपिक्स में तो वे टीम की कप्तानी कर रहे थे। इन तीनों ओलंपिक्स में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता। रिकॉर्ड्स की बात की जाये तो ध्यानचंद वहां भी बेजोड़ थे। ध्यानचंद ने अंतर्राष्ट्रीय मुकाबले में 300 से भी ज्यादा गोल दागे। साल 1956 में उनको पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। दिल्ली में एक हॉकी स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रखा गया। हॉकी के जादूगर जिंदगी के आखिरी पड़ाव में लंबे वक्त तक कैंसर से जूझते रहे। साल 1979 में उनका निधन हो गया।

राजीव गांधी खेल रत्न बना मेजर ध्यानचंद खेल-रत्न
हाल ही में जब टोक्यो ओलंपिक्स में भारतीय पुरुष और महिला हॉकी टीम ने शानदार प्रदर्शन किया। पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल बाद ओलंपिक में पदक जीता तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश के प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार को मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार कर दिया। हालांकि अभी भी खेल प्रेमियों को इस बात का इंतजार है कि कब उन्हें भारत रत्न से भी नवाजा जायेगा।