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चुनाव आयुक्त नियुक्ति मामले में सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा, काश जजों की नियुक्ति भी ऐसे होती!

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द फॉलोअप डेस्क

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को टिप्पणी की कि काश जजों की नियुक्ति भी उतनी ही तेज़ी से होती, जितनी चुनाव आयुक्तों की। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। इस विधेयक के अनुसार, चुनाव आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति एक चयन पैनल द्वारा की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होंगे।

याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया ने दलील दी कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति बहुत तेज़ी से की गई, और इसमें विपक्ष के नेता से कोई प्रभावी परामर्श नहीं किया गया। उन्होंने बेंच को बताया कि 2024 में, नए कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर रोक लगाने के लिए एक अर्जी दायर की गई थी। हंसारिया ने दावा किया कि कोर्ट में इस अर्जी पर सुनवाई होने से पहले ही, केंद्र सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जल्दबाज़ी में कदम उठाए।

ज्ञानेश कुमार तथा सुखबीर संधू के नामों का चयन कर लिया गया

उन्होंने कहा कि 13 मार्च, 2024 को विपक्ष के नेता को 200 नामों की एक शॉर्टलिस्ट सौंपी गई। अगले ही दिन, चयन समिति की बैठक हुई और ज्ञानेश कुमार तथा सुखबीर संधू के नामों का चयन कर लिया गया। हंसारिया ने कहा, "जब आप किसी एक व्यक्ति को असीमित अधिकार दे देते हैं, तो यही होता है। विपक्ष के नेता से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वह एक ही दिन में इतने सारे नामों की पड़ताल कर लें?"

जस्टिस दत्ता ने टिप्पणी करते हुए कहा, "हम तो बस यही कह सकते हैं कि काश जजों की नियुक्ति में भी ऐसी ही तेज़ी दिखाई जाती। खासकर, हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में।" वहीं दूसरी ओर, बेंच इस दलील को मानने के लिए तैयार नहीं थी कि नियुक्तियां इतनी जल्दबाज़ी में इसलिए की गईं ताकि रोक लगाने वाली अर्जी पर होने वाली सुनवाई को बाधित किया जा सके। बेंच ने पूछा कि यह कैसे मान लिया जाए कि केंद्र सरकार को इस बात की जानकारी थी कि 15 मार्च को इस अर्जी पर सुनवाई होने वाली है?

कहां हुई गड़बड़ी

जस्टिस दत्ता ने कहा, "क्या आप बिना यह साबित किए कोई दुर्भावना (motive) आरोपित कर सकते हैं कि केंद्र सरकार को 15 मार्च की तारीख के बारे में पता था? जब आप हमसे यह घोषणा करवाना चाहते हैं कि कोई कदम किसी दुर्भावना से प्रेरित होकर उठाया गया था, तो आपको हमें इस बात से संतुष्ट करना होगा कि केंद्र सरकार को भी 15 मार्च की तारीख के बारे में पता था, और इसीलिए (चयन की प्रक्रिया को) 14 मार्च को ही पूरा कर लिया गया।"

जब हंसारिया ने यह स्वीकार किया कि उनके पास केंद्र सरकार को ऐसी जानकारी होने की बात साबित करने के लिए कोई सामग्री नहीं है, तो जस्टिस दत्ता ने उनसे इस दलील पर ज़ोर न देने को कहा। "चलिए, बात यहीं खत्म करते हैं।" हंसारिया ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता किसी भी व्यक्तिगत चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को चुनौती नहीं दे रहा है, बल्कि वह इस अधिनियम की वैधता पर सवाल उठा रहा है।
 

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