रांची
झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य के दो जिला सहकारिता पदाधिकारियों, जगमनी टोप्पो और उमेश कुमार सिन्हा के मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि MACP का लाभ किसी भी हाल में रेगुलर प्रमोशन का विकल्प नहीं हो सकता। न्यायाधीश दीपक रौशन की अदालत ने इस बात पर कड़ा रुख अपनाया कि वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी कर जूनियर को प्रमोशन देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट ने अब राज्य सरकार को यह कड़ा निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ताओं के मामलों को विभागीय प्रमोशन समिति डीपीसी के समक्ष रखा जाए और कानून व नियमों के दायरे में रहकर इस पर उचित निर्णय लिया जाए।
क्या है मामला आइए जानें
इस पूरे विवाद की जड़ याचिकाकर्ताओं को लंबे समय से सेवा लाभ न मिलना है। साल 2008 में सहायक निबंधक/जिला सहकारिता पदाधिकारी के रूप में नियुक्त हुए इन अधिकारियों की सेवा 2010 में ही कन्फर्म हो गई थी, लेकिन विडंबना यह रही कि 17 साल बीत जाने के बाद भी उन्हें कोई नियमित प्रमोशन नहीं दी गई। विभाग में उप निबंधक और संयुक्त निबंधक के कई पद खाली होने के बावजूद सरकार ने केवल एमएसीपी का लाभ मिलने का हवाला देकर अपना पल्ला झाड़ना चाहा, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह खारिज कर दिया। अब अदालत ने सरकार को 12 सप्ताह के भीतर डीपीसी की बैठक बुलाकर प्रमोशन के दावे पर अंतिम फैसला लेने की समयसीमा तय की है। यदि याचिकाकर्ता इस पद के योग्य पाए जाते हैं, तो उन्हें उनके जूनियरकी प्रमोशन की तारीख से ही नोशनल प्रमोशन के साथ-साथ सभी संबंधित सेवा लाभ सौंपे जाएंगे।