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भाजपा का आदिवासी दांव : क्या पवन साय और गजेंद्र पटेल की पोस्टिंग से बदलेगा वोटों का गणित?

क्या पवन साय और गजेंद्र पटेल की पोस्टिंग से बदलेगा वोटों का गणित?

द फॉलोअप, रांची
झारखंड में सत्ता से दूर भाजपा ने संगठन में बड़ा बदलाव किया है। इसका सबसे बड़ा संदेश है कि पार्टी आदिवासी समाज के नेताओं के सहारे अपनी सबसे कमजोर कड़ी को मजबूत करना चाहती है। भाजपा ने 23 सितंबर को संगठनात्मक नियुक्तियों की सूची जारी की। इसमें मध्य प्रदेश के सांसद गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का प्रदेश प्रभारी बनाया गया और सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह को सह-प्रभारी। यह पहला मौका है जब पार्टी ने झारखंड में किसी आदिवासी नेता को यह जिम्मेदारी दी है। अगले ही दिन 24 सितंबर को संगठन महामंत्रियों की सूची आई। छत्तीसगढ़ में कर्मवीर सिंह को प्रदेश संगठन महामंत्री बनाया गया। वहीं छत्तीसगढ़ के पवन साय को झारखंड का दायित्व सौंपा गया है। इस तरह प्रभारी और संगठन मंत्री के दोनों शीर्ष पदों पर अब आदिवासी पृष्ठभूमि के नेता हैं। 


 

झारखंड भाजपा की "कमी" भांपकर लिया गया है फैसला ?
पार्टी ने ऐसा आधिकारिक तौर पर नहीं कहा है पर आंकड़े खुद वजह बताते हैं। झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में 28 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं और 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा इनमें साफ हो गई। केवल एक सीट भाजपा के खाते में आयी और वह भी झामुमो से आए चंपाई सोरेन ही जीत सके। उसी के बाद ही झारखंड के लिए नई रणनीति बन रही है। 

ये हो सकती है बड़ी वजह 
बाबूलाल मरांडी विपक्ष के नेता हैं और प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू हैं। वहीं पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरने भी अब भाजपा के साथ हैं। फिर भी संथाल परगना, कोल्हान और दक्षिणी छोटानागपुर में पार्टी के पास हेमंत सोरेन की टक्कर का आदिवासी चेहरा नहीं उभरा। जल, जंगल, जमीन, सरना धर्म कोड और सीएनटी और एसपीटी कानून जैसे मुद्दों पर जेएमएम की भावनात्मक पकड़ मजबूत बनी हुई है। भाजपा के घुसपैठिया और डेमोग्राफी वाले नैरेटिव का असर आदिवासी इलाकों वोट बैंक में परिणत नहीं हो रहा है। आदिवासी मतदाता भाजपा को गैर-आदिवासी नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में देख रहे हैं। प्रभारी और संगठन मंत्री की नियुक्ति इसी छवि को तोड़ने की कोशिश है।

हेमंत सोरेन से कैसे दूर होंगे आदिवासी वोटर 
यह भाजपा के लिए सबसे कठिन सवाल है। हेमंत सोरेन के पास जेल जाने के बाद की सहानुभूति, आदिवासी अस्मिता की राजनीति और महिलाओं के लिए मईयां सम्मान योजना जैसी ताकतें हैं। इन्हें सिर्फ चेहरे बदलकर नहीं तोड़ा जा सकता। इसलिए अपनी रणनीति बदल सकती है। सरकार के खिलाफ स्थानीय मुद्दे जैसे विस्थापन, खनन से प्रभावित गांव, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और भ्रष्टाचार के आरोप को मुख्य मुद्दा बना सकती है। सामाजिक इंजीनियरिंग के सहारे संथाल, मुंडा, उरांव और हो जैसे अलग-अलग समुदायों के लिए अलग नेतृत्व और अलग संदेश देने की भी कोशिश कर सकती है। धर्मांतरण और सांस्कृतिक पहचान पर हमला को बड़ा मुद्दा बना कर सरना समाज को धर्मांतरित आदिवासियों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश कर सकती है। यह तरकीब छत्तीसगढ़ में भाजपा के लिए सफल भी रहा है। बूथ स्तर का काम में भी संघ परिवार के वनवासी कल्याण आश्रम जैसे संगठनों की मदद से गांव-गांव तक पहुंच बनाई जा सकती है।

छत्तीसगढ़ मॉडल के सहारे झारखंड भाजपा 
2018 में छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में भाजपा को भारी नुकसान हुआ था। 2023 में उसने वापसी की। इसकी सबसे बड़ी बजह बनी सरगुजा संभाग में लगभग सारी सीट पर जीत और बस्तर में बढ़त। इन इलाको में जीत के पीछे कुछ प्रमुख कारण माने जाते हैं। विष्णुदेव साय को चेहरा बनाकर पार्टी ने आदिवासी को सम्मान का संदेश दिया। बस्तर और सरगुजा में इसे आदिवासी पहचान से जोड़ा गया। पेसा कानून के तहत धर्मांतरित आदिवासियों को दी गयी महत्वपूर् जगह को पवन साय ने सरना आदिवासियों की हक मारी से जोड़ दिया। साथ ही राज्य में शराब और कोयला घोटाले जैसे मामले, जिन्हें भाजपा ने प्रमुखता से उठाया। संगठन की माइक्रो-प्लानिंग की गयी। पवन साय जैसे संगठन के नेताओं ने बूथ स्तर तक मेहनत की। इसी वजह से उन्हें झारखंड भेजना छत्तीसगढ़ मॉडल को दोहराने की कोशिश माना जा रहा है।

क्या झारखंड में यही फॉर्मूला चलेगा या यहां भाजपा के सामने है अलग चुनौती 
छत्तीसगढ़ में सत्ता विरोधी लहर थी लेकिन झारखंड में फिलहाल ऐसा कुछ नहीं दिखता है। 2024 में जनादेश हेमंत सोरेन के पक्ष में रहा। अगला विधानसभा चुनाव 2029 में है। यानी पार्टी के पास तैयारी का समय है, पर मुद्दे अभी बनने बाकी हैं। झारखंड में जेएमएम की जड़ें गहरी हैं। छत्तीसगढ़ की तरह यहां क्षेत्रीय ताकत कमजोर नहीं है। झामुमो आदिवासी अस्मिता की मजबूत पार्टी है। सरना कोड बनाम धर्मांतरण की बहस में भाजपा को भारी मशक्कत करनी पड़ सकती है। झारखंड में ईसाई आदिवासियों की बड़ी आबादी है। धर्मांतरण का मुद्दा उठाने पर समाज के बंटने और उलटा असर होने का जोखिम भी है। गजेंद्र पटेल मध्य प्रदेश के हैं। उन्हें झारखंड की जनजातीय बारीकियां समझने में समय लग सकता है।

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