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हेमंत सोरेन के आदिवासी जनाधार में क्या सेंध लगा पाएंगे गजेंद्र सिंह पटेल ?

हेमंत सोरेन के आदिवासी जनाधार में क्या सेंध लगा पाएंगे गजेंद्र सिंह पटेल ?

द फॉलोअप, रांची
झारखंड की सियासत का सबसे बुनियादी सच यही है कि राज्य की सत्ता की चाबी 28 अनुसूचित जनजाति आरक्षित सीटों से होकर गुजरती है। इन सीटों का बड़ा हिस्सा जिस खेमे में जाता है, राज्य में सरकार उसी की बनती है। विधानसभा चुनावों के हालिया आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि आदिवासी मतदाता भाजपा से छिटककर पूरी मजबूती से 'इंडिया' गठबंधन के साथ खड़ा हुआ है, जहां 28 में से 27 एसटी सीटों पर गठबंधन का कब्जा है। हेमंत सोरेन खुद को आदिवासियों के निर्विवाद नेता के रूप में स्थापित कर चुके हैं और लंबे शासनकाल के बावजूद आदिवासी समाज में उनके खिलाफ किसी प्रभावी सत्ता विरोधी लहर का अभाव रहा है। ऐसे में मध्य प्रदेश से आने वाले आदिवासी सांसद गजेंद्र सिंह पटेल के सामने हेमंत सोरेन की इस राजनीतिक पकड़ को चुनौती देना कोई आसान काम नहीं होगा। इस सियासी समीकरण को चार प्रमुख पहलुओं से समझा जा सकता है।


 

भावनात्मक अस्मिता बनाम बाहरी संगठनात्मक चेहरा
झारखंड के आदिवासी समाज में हेमंत सोरेन सिर्फ एक मुख्यमंत्री या प्रशासक नहीं, बल्कि 'दिशोम गुरु' शिबू सोरेन के राजनीतिक उत्तराधिकारी और ‘जल-जंगल-जमीन’ के स्वाभिमान के प्रतीक हैं। उनके खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों और गिरफ्तारी की घटनाक्रम को आदिवासी समाज के एक बड़े हिस्से ने "आदिवासी अस्मिता पर प्रहार" के रूप में देखा, जिससे उनके पक्ष में सहानुभूति और सामाजिक ध्रुवीकरण और गहरा हुआ। दूसरी ओर, गजेंद्र सिंह पटेल भले ही स्वयं आदिवासी समाज से आते हों, लेकिन वे मध्य प्रदेश की भील-बिलाला पट्टी की पृष्ठभूमि से हैं। झारखंड के संथाली, मुंडा, उरांव और हो समाज की सांस्कृतिक बनावट, परंपराएं और स्थानीय आकांक्षाएं मध्य भारत के आदिवासियों से अलग हैं। संगठन का प्रभारी बनकर चुनावी रणनीति बनाना एक बात है, लेकिन स्थानीय आदिवासी जनमानस में हेमंत के कद का स्वाभाविक भावनात्मक विकल्प बनना पूरी तरह अलग चुनौती है।


27 बनाम 1 का गणित और हेमंत का 'कल्याणकारी सुरक्षा कवच'
28 में से 27 एसटी सीटों पर झामुमो-कांग्रेस का कब्जा यह साबित करता है कि जमीन पर हेमंत का समीकरण बेहद ठोस है। ‘मंईयां सम्मान योजना, अबुआ आवास और पेंशन योजनाओं ने ग्रामीण और महिला मतदाताओं के बीच हेमंत की छवि को मजबूत किया है। सरना धर्म कोड और स्थानीयता के मुद्दों पर हेमंत सोरेन ने लगातार फ्रंटफुट पर राजनीति की है, जिससे आदिवासी वोटर उन्हें अपने अधिकारों का रक्षक मानता है। भाजपा के पास पहले से बाबूलाल मरांडी और अर्जुन मुंडा जैसे कद्दावर स्थानीय आदिवासी चेहरे मौजूद रहे हैं, फिर भी पार्टी 2019 और 2024 के चुनावों में एसटी सीटों पर व्यापक समर्थन नहीं जुटा सकी। ऐसे में पटेल के सामने चुनौती सिर्फ चेहरा बदलने की नहीं, बल्कि उस नैरेटिव को काटने की है जो भाजपा के खिलाफ बना हुआ है। उससे भी बड़ी चुनौती बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा, रघुवर दास, चंपाई सोरेन जैसे कद्दावर नेताओं को न सिर्फ बातचीत के टेबल बैठाने की होगी, बल्कि भावनात्मक रूप से एक दूसरे से जोड़ने की भी रहेगी। क्योंकि जब तक इन पीलरों को एक दूसरे से नहीं जोड़ा जाएगा, झारखंड भाजपा सांगठनिक इमारत बहुत मजबूत नहीं होगा।


पटेल के जरिए भाजपा की रणनीति और संभावनाएं
गजेंद्र सिंह पटेल को मैदान में उतारने का मकसद सीधे हेमंत सोरेन से जननेता के रूप में टकराना नहीं, बल्कि संगठन के जरिए जेएमएम की घेराबंदी करना है। पटेल लंबे समय से वनवासी कल्याण आश्रम और जनजातीय मामलों में सक्रिय रहे हैं। झारखंड में गैर-ईसाई आदिवासियों के बीच डी-लिस्टिंग की मांग को हवा देकर भाजपा आदिवासी वोट बैंक में विभाजन की संभावना तलाशती रही है। पटेल इस मोर्चे पर माइक्रो-मैनेजमेंट कर सकते हैं। भाजपा लगातार बांग्लादेशी घुसपैठ और आदिवासियों की घटती आबादी का मुद्दा उठा रही है। पटेल इस नैरेटिव को धार देकर स्थानीय आदिवासियों में असुरक्षा की भावना को चुनावी लामबंदी में बदलने का प्रयास करेंगे। प्रदेश भाजपा के भीतर नेताओं की आपसी खींचतान जगजाहिर रही है। एक निष्पक्ष केंद्रीय आदिवासी प्रभारी के रूप में पटेल गुटबाजी को थामकर बूथ स्तर पर एसटी मोर्चे को सक्रिय कर सकते हैं। गजेंद्र सिंह पटेल की नियुक्ति से भाजपा संगठन में एक संदेश और सक्रियता जरूर आ सकती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हेमंत सोरेन की मजबूत पकड़ को कमजोर कर पाना पटेल के लिए एक बेहद कठिन और पथरीली राह है।

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