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MMDRA : सरकार पारित कराएगी विधानसभा से विरोध में प्रस्ताव, क्या इसका भी हश्र सरना धर्म कोड वाला होगा

सरकार पारित कराएगी विधानसभा से विरोध में प्रस्ताव, क्या इसका भी हश्र सरना धर्म कोड वाला होगा

द फॉलोअप, रांची
खनिजों पर सेस और अन्य शुल्क लगाने के राज्यों के अधिकार को लेकर केंद्र और झारखंड सरकार के बीच का विवाद अब विधानसभा तक पहुंच रहा है। झारखंड सरकार 5 और 6 अक्टूबर को विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की तैयारी में है और इसका प्रस्ताव 25 सितंबर की कैबिनेट बैठक में रखने पर सरकार विचार कर रही है। हालांकि मानसून सत्र का अभी सत्रावसान नहीं हुआ है। इसलिए विधायक दल के नेता के रूप में मुख्यमंत्री सीधे स्पीकर को पत्र लिख कर विशेष सत्र बुलाने का आग्रह कर सकते हैं। इसमें कैबिनेट की स्वीकृति लेने की अनिवार्यता नहीं है। पर सरकार के शीर्ष स्तर पर कैबिनेट की स्वीकृति के माध्यम से विशेष सत्र बुलाने का फैसला लिया जा सकता है। सरकार का मानना है कि इससे विशेष सत्र के महत्व को मजबूती मिलेगी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विरोध में पारित कराये जाने वाले प्रस्ताव का हस्र भी सरना धर्म कोड वाली होगी।


 

क्या है विवाद की जड़
केंद्र सरकार ने MMDR अधिनियम, 1957 में संशोधन किया है। इस संशोधन अधिनियम को 17 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। इसके तहत राज्य केंद्र सरकार की तय शर्तों के दायरे में ही खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर या शुल्क लगा सकेंगे। संशोधन के अनुसार बकाया और अवसूली मांगें अमान्य होंगी और पहले वसूली जा चुकी राशि की वापसी पर भी रोक होगी। यह कानून सुप्रीम कोर्ट के 2024 के उस फैसले की काट माना जा रहा है, जिसमें नौ-न्यायाधीशों की पीठ ने माना था कि राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी क्षमता है और MMDR अधिनियम इस शक्ति को सीमित नहीं करता। उसी फैसले ने राज्यों को 1 अप्रैल 2005 से पिछली बकाया राशि वसूलने की अनुमति भी दी थी, जिसका भुगतान 12 साल में किश्तों में होना था। 

सत्ता पक्ष का तर्क: यह राज्य का अधिकार है, जो अदालत ने दिया
झारखंड सरकार का कहना है कि इस संशोधन से राज्य के राजस्व को भारी चोट पहुंचेगी। सरकार की ओर से संभावित नुकसान का अनुमान करीब 14 हज़ार करोड़ रुपये सालाना बताया जा रहा है। कोयला, बॉक्साइट जैसे खनिजों पर जो उपकर राज्य अब तक लगा रहा था, उस पर आगे वह स्वतंत्र रूप से कर नहीं लगा सकेगा। वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा है कि सेस वसूली राज्य का अधिकार है और यह अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने दिया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहले ही राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिख चुके हैं और 18 अगस्त की कैबिनेट बैठक के बाद उन्होंने विधानसभा में चर्चा कर आगे की रणनीति बनाने की बात कही थी। उनका कहना रहा है कि झामुमो हर स्तर पर इसका विरोध करेगा और ज़रूरत पड़ी तो विशेष सत्र में प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा जाएगा। सत्ताधारी दलों के नेताओं की माँग है कि जैसे पहले सरना धर्म कोड जैसे मुद्दों पर विधानसभा से प्रस्ताव पारित हुआ था, वैसे ही इस संशोधन को वापस लेने का प्रस्ताव भी पारित कर बड़ा संदेश दिया जाए। हालांकि इसका भी हस्र सरना धर्म कोड की ही तरह होने की पूरी संभावना है। 


 

विपक्ष और केंद्र का पक्ष: अलग-अलग कर से खनिज महंगे होंगे
भाजपा का तर्क है कि राज्य सरकार के करों की वजह से अगर खनिज महंगे हो जाएंगे, तो कंपनियां उन्हें खरीदेंगी ही नहीं, इसलिए एक समान ढाँचे वाले इस कानून की ज़रूरत है। पार्टी नेताओं ने महागठबंधन के नेताओं को कानून का अध्ययन करने की सलाह भी दी है। केंद्र के पक्ष में जो आंकड़े और तर्क दिए जा रहे हैं, वे भी इसी दिशा में हैं। खनन पर रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, DMF और GST समेत लगभग 14 कर और शुल्क लगते हैं। अलग-अलग राज्यों के अतिरिक्त शुल्कों से खनिज की लागत में बड़ा अंतर आता है, और कुछ राज्यों ने खनिज-युक्त भूमि पर 20% तक शुल्क लगाया है। भारत ने वित्त वर्ष 2025-26 में 10.12 लाख करोड़ रुपये के खनिज आयात किए, इसलिए आयात निर्भरता घटाना ज़रूरी बताया गया है। केंद्र के अनुसार विधेयक राज्यों के राजस्व हितों और एकसमान खनिज विकास, किफायती आपूर्ति व निवेश की निश्चितता के राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन बनाता है। वही हेमंत सोरेन सरकार का मानना है कि इस संशोधन से कम से कम राज्य को हर साल 15000 करोड़ रूपये का कम से कम नुकसान होगा।
कानूनी और संवैधानिक सवाल
संविधान में खनिज कराधान की शक्तियां बंटी हुई हैं। राज्य सूची की प्रविष्टि 50 के अनुसार राज्य खनिज अधिकारों पर कर लगा सकता है, पर संसद कानून बनाकर इस शक्ति को सीमित कर सकती है। केंद्र ने इसी रास्ते का सहारा लिया है। पर आलोचकों की राय अलग है। कुछ विश्लेषकों के अनुसार इस कानून के इच्छित नतीजे पर प्रक्रियात्मक और संवैधानिक चुनौतियां हैं। राजकोषीय संघवाद, राज्यों की कराधान शक्ति और पूर्वव्यापी कानून पर चिंताएं भी जताई गई हैं।  अब सबकी नज़र 25 सितंबर की कैबिनेट बैठक पर है। मंज़ूरी मिली तो 5-6 अक्टूबर को सदन में प्रस्ताव पर चर्चा होगी। सत्र सिर्फ राजनीतिक संदेश तक सीमित रहेगा या बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगी, यह आने वाले दिनों में साफ़ होगा।

Tags - Jharkhand MMDRA Legislative Assembly special session resolution of opposition