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पुलिस संस्मरण दिवस पर छलका DC कंचन सिंह का दर्द, नक्सल प्रभावित पलामू में छह महीने के बच्चे को गोद में लेकर राइफल के साथ गुजारी थीं खौफनाक रातें

पुलिस संस्मरण दिवस पर छलका DC कंचन सिंह का दर्द, नक्सल प्रभावित पलामू में छह महीने के बच्चे को गोद में लेकर राइफल के साथ गुजारी थीं खौफनाक रातें

द फॉलोअप डेस्क, रांचीः
पुलिस संस्मरण दिवस के मौके पर सिमडेगा की उपायुक्त (DC) कंचन सिंह ने अपने जीवन के उन अनुभवों को साझा किया है, जब झारखंड के नक्सल प्रभावित इलाकों में पुलिसकर्मियों के साथ-साथ उनके परिवारों की जिंदगी भी चुनौतियों से भरी थी। एसीबी डीआईजी चंदन सिन्हा की पत्नी कंचन सिंह ने अपने फेसबुक पोस्ट में पलामू में बिताए दिनों को याद करते हुए पुलिसकर्मियों और उनके परिजनों के संघर्ष, भय और बलिदान की भावुक तस्वीर पेश की है। कंचन सिंह ने लिखा कि साल 2002 में जब नवगठित झारखंड में नक्सल समस्या चरम पर थी, तब उन्होंने एक पुलिस अधिकारी को अपना जीवनसाथी चुना। उन्हें चुनौतियों का अंदाजा था, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों का सामना करने के बाद समझ आया कि किसी कठिनाई के बारे में जानने और उसे जीने में कितना अंतर होता है।


नक्सल प्रभावित पलामू में खौफ के बीच गुजरे दिन
कंचन सिंह के मुताबिक, पति चंदन सिन्हा की पहली पोस्टिंग पलामू के छतरपुर में हुई थी। उस समय उनका आवास हरिहरगंज के डाकबंगले में था। उसी परिसर में कार्यालय और जवानों के रहने के लिए बैरक भी थी। उनसे पहले पदस्थापित अधिकारी नक्सल ऑपरेशन में शहीद हो चुके थे। उस दौर में बिजली, मोबाइल फोन और पर्याप्त पुलिस बल जैसी बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव था। उन्होंने बताया कि नक्सल विरोधी अभियान के लिए खुफिया सूचनाएं जुटाने से लेकर योजना बनाने और ऑपरेशन चलाने तक की प्रक्रिया कई दिनों तक चलती थी। अक्सर रात दो से ढाई बजे के बीच उनके पति एंटी माइन व्हीकल से जवानों के साथ अभियान पर निकलते थे। उस समय गाड़ी के पहियों की आवाज उन्हें ऐसा महसूस कराती थी, मानो पहिए उनके दिल पर चल रहे हों। छह महीने के बच्चे को गोद में लेकर उन्होंने कई रातें बंद कमरे में बिताईं। सुरक्षा की चिंता इतनी गहरी थी कि साइड टेबल पर अतिरिक्त मैगजीन के साथ राइफल रखी रहती थी। किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने फायरिंग और ड्राइविंग भी सीखी।


जवानों को लस्सी पिलाकर ऑपरेशन पर भेजती थीं
कंचन सिंह ने अपने पोस्ट में लिखा कि वह घर में हमेशा सूखा खाना तैयार रखती थीं, ताकि अचानक ऑपरेशन पर निकलने की स्थिति में जवानों को कुछ खिलाकर भेज सकें। उनकी कोशिश रहती थी कि अभियान पर जाने वाले हर जवान को कुछ न कुछ खाने के लिए मिल जाए। उन्होंने बताया कि उनकी मां ने सिखाया था कि दही-चीनी खाकर निकलना शुभ होता है। इसलिए वह लगभग हर दिन बड़े बर्तन में दही जमाती थीं और पति के ऑपरेशन पर निकलने से पहले लस्सी बनाकर सभी जवानों को पिलाती थीं। घर की सुरक्षा के लिए चंदन सिन्हा ने परिसर में ट्रेंच बनवाए थे। मॉक ड्रिल के दौरान कंचन सिंह भी जवानों के साथ शामिल होती थीं। उन्होंने बताया कि उनके वहां से स्थानांतरण के कुछ महीने बाद उसी घर पर भीषण हमला हुआ था। बाद में पता चला कि हमले को नाकाम करने में उन ट्रेंच की अहम भूमिका रही थी।


शहीद जवानों को याद कर भावुक हुईं कंचन सिंह
अपने पोस्ट में उन्होंने अमरजीत बलिहार, शमशाद आलम और शतानंद जैसे पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को याद किया। उन्होंने लिखा कि साथ उठने-बैठने और साथ समय बिताने वाले लोगों के अचानक चले जाने से पैदा हुआ खालीपन जीवनभर बना रहता है। कंचन सिंह ने पलामू के एसपी के रूप में तैनाती के दौरान चंदन सिन्हा के अंगरक्षक रहे सुनील को विशेष रूप से याद किया। उन्होंने छठ पूजा के दौरान साथ तस्वीर खिंचवाने की जिद करने और मकर संक्रांति पर दही-चूड़ा खाते समय साहब के बगल में जगह नहीं मिलने पर रूठ जाने जैसी यादें साझा कीं। उन्होंने लिखा कि सुनील का जाना उनके लिए बेहद हृदयविदारक था। जिस साहस के साथ उसने सर्वोच्च बलिदान दिया, उसके लिए झारखंड पुलिस और राज्य हमेशा उसके ऋणी रहेंगे।


पुलिसकर्मियों के कल्याण के लिए सरकार के प्रयासों का जिक्र
कंचन सिंह ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पुलिसकर्मियों और उनके परिवारों के कल्याण के लिए उठाए गए कदमों की सराहना भी की। उन्होंने पुरानी पेंशन बहाली, 13वें महीने के वेतन, 20 दिनों के क्षतिपूरक अवकाश, बेहतर आवासन और थानों में नई गाड़ियों की व्यवस्था जैसे फैसलों का उल्लेख किया। उन्होंने विशेष रूप से स्टेट बैंक पुलिस सैलरी पैकेज अकाउंट और ग्रुप टर्म प्लान के तहत नक्सली गतिविधियों या दुर्घटना में पुलिसकर्मी की मृत्यु होने पर उनके परिजनों को कुल 1.10 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता दिए जाने का जिक्र किया। कंचन सिंह के अनुसार, किसी अपने को खोने के दर्द की भरपाई आर्थिक सहायता से नहीं की जा सकती, लेकिन ऐसे फैसले मुश्किल समय में परिवारों को संबल देते हैं। साथ ही पुलिसकर्मियों में यह भरोसा पैदा करते हैं कि कर्तव्य निभाते समय सरकार उनके और उनके परिवारों के कल्याण के प्रति प्रतिबद्ध है। पुलिस संस्मरण दिवस पर साझा किया गया उनका यह अनुभव उन अनगिनत परिवारों के संघर्ष को सामने लाता है, जो वर्दी पहनकर देश और राज्य की सुरक्षा में जुटे जवानों के साथ हर दिन अनिश्चितता, भय और इंतजार के बीच जीवन बिताते हैं।