द फॉलोअप डेस्क, रांची:
JPSC मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता हरिशरण देवगन की भूमिका को लेकर झारखंड के छात्र आंदोलन से जुड़े कई सवाल खड़े हो रहे हैं। हरिशरण देवगन की राजनीतिक प्रतिबद्धता और सार्वजनिक बयानों ने उनकी भूमिका पर संदेह पैदा किया है। आरोप है कि हरिशरण देवगन भाजपा से जुड़े मामलों में वकालत कर चुके हैं और जंतर-मंतर पर आंदोलनरत छात्रों का पुरजोर विरोध कर चुके हैं। उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के अनशन पर भी सवाल उठाए थे। यही नहीं, सांसद मार्च के दौरान छात्रों के साथ हुई कथित बर्बरता और पुलिस कार्रवाई को भी उन्होंने उचित ठहराया था। इसके बाद धरने पर बैठे राहुल गांधी के खिलाफ भी उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा था।

याचिका दायर करने राजनीतिक रणनीति तो नहीं!
इन घटनाओं के बाद कई छात्र आशंका जता रहे हैं कि कहीं JPSC मामले में याचिका दायर कराने के पीछे भी कोई राजनीतिक रणनीति तो नहीं है। हरिशरण देवगन के पुराने पोस्ट वायरल हो रहे हैं और उनकी भाजपा नेताओं के साथ की तस्वीरें भी तेजी से वायरल हो रही हैं। हालांकि, इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। हरिशरण देवगन अपने पोस्ट्स में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को मोदी जी के मास्टर स्ट्रोक बताते हुए भी नजर आए हैं। छात्रों के एक वर्ग का कहना है कि हरिशरण देवगन का झारखंड के छात्रों की समस्याओं से वास्तविक सरोकार कम और राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित भूमिका अधिक दिखाई देती है।

राजनीतिक पकड़ के लिए छात्रों के मुद्दे का इस्तेमाल!
आलोचकों का आरोप है कि वे राजनीतिक विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच अपनी पकड़ और पहचान मजबूत करने के लिए छात्रों के मुद्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आरोपों के अनुसार, झारखंड का छात्र आंदोलन पहले ही राजनीतिक दलों और कथित कोचिंग माफियाओं के प्रभाव में कमजोर हो चुका है। कई छात्र दबे स्वर में आरोप लगा रहे हैं कि आंदोलन को राजनीतिक हितों के लिए इस्तेमाल किया गया और इसके माध्यम से भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश हुई।
पूरे मामले में पारदर्शिता और स्पष्ट जवाब की मांग
कुछ छात्रों का यह भी आरोप है कि कथित कोचिंग माफिया के कुछ सरगनाओं ने छात्र आंदोलन को एक तरह के राजनीतिक और आर्थिक अवसर के रूप में देखना शुरू कर दिया है। विधानसभा टिकट की जुगाड़ से लेकर आर्थिक लाभ तक की चर्चाओं ने आंदोलन की नीयत और दिशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। छात्रों का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उनका आंदोलन वास्तव में उनके अधिकारों और भविष्य के लिए लड़ा जा रहा है, या फिर उनके कंधों पर बंदूक रखकर राजनीतिक निशाने साधे जा रहे हैं? इस पूरे मामले में पारदर्शिता और स्पष्ट जवाब की मांग लगातार तेज हो रही है।