जीतेंद्र कुमार
झारखंड का प्रत्येक राजनीतिक दल बोल रहा है। क्या आपको उनकी आवाज सुनाई दे रही है। शायद नहीं। आपकी गलती नहीं है। आवाज ही बहुत धीमी है। आवाज धीमी हो तो भला सुनाई भी कैसे दे। लेकिन यहां एक बहुत बड़ा इंटरनल अंडरस्टैंडिंग है। किसी दल की आवाज ऊंची नहीं है। अमूमन कोई दल किसी विषय पर जोर से बोलता है तो कोई आग भी उगलता है। कोई बोल के चुप हो जाता है। लेकिन यहां सबकी आवाज एक जैसी धीमी है। सीबीआई जांच की मांग पर कभी कभी किसी दल की आवाज सुनाई दे जाती है। फिर वह दब जाती है। भला ऐसा क्यों हो रहा है। इसकी भी अब सीबीआई जांच की ही नौबत दिखायी पड़ रही है।


यहां हम झारखंड गठन के बाद के सबसे पहले मेरिट घोटाले की चर्चा कर रहे हैं। जेपीएससी-1 और टू के घोटाले। पहले इसकी जांच का जिम्मा निगरानी को मिला था। उस पर जब निष्पक्ष नहीं रहने का आरोप लगा तो हाईकोर्ट ने जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंप दिया। सीबीआई भी इसकी 18-20 वर्षों से जांच कर रही है। हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट भी सौंपी है। इसी तरह 2008 में एक और मेरिट घोटाला हुआ था। लेक्चरर नियुक्ति घोटाला। लगभग 14 वर्षों से सीबीआई इसकी भी जांच कर रहा है। यह मामला भी हाईकोर्ट में सोया हुआ है। इधर जेपीएससी और जेएसएससी की प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई गड़बड़ी की सीआईडी जांच कर रही है। इसकी जगह सीबीआई जांच की मांग जोर पकड़ रही है।

ये सब तो कहानी थी। क्योंकि जेपीएससी-1 और टू की सीबीआई जांच अब इतिहास बनने के कगार पर है। इन दोनों परीक्षाओं से नियुक्त हुए अधिकारी अब एक एक कर रिटायर हो रहे हैं। जो बचे हैं, उन्हें समय समय पर प्रोन्नति भी मिलती जा रही है। लेकिन मूल सवाल एक ही है। सभी दल इस पर मौन क्यों है। राज्य में बनी किसी दल की सरकार ने इस घोटाले के आरोपियों के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति क्यों नहीं दी। यह समानता क्यों है। समानता के पीछे की समानता क्या है। अगर आप यह समझ गए तो झारखंड के दल, दल-दल और उनकी दलीलें भी समझ जाएंगे। जय झारखंड।