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सरकारी पहल से बचेगा बचपन : जामताड़ा में सगे आदिवासी भाई-बहन अनाथ हो गए, ना शिक्षा मिल रही न राशन

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दीपक कुमार/जामताड़ा:

आपकी स्क्रीन पर नजर आ रहे ये दोनों बच्चे अनाथ हैं। 7 साल की मंजू सोरेन और 4 वर्षीय सुशील सोरेन का जन्म प्रमाण पत्र भी नहीं बना। इनके पास आधार कार्ड भी नहीं है, जिसकी वजह से बच्चे सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से वंचित हैं। जन्म प्रमाण पत्र और आधार कार्ड नहीं होने से बच्चों का दाखिला भी स्कूल में नहीं हो पाया है। फिलहाल, मंजू और सुशील की देखभाल उनकी बड़ी मां बालमुनि हेम्ब्रम करती हैं, लेकिन उनकी भी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। बालमुनि, ईंट भट्टे पर दिहाड़ी करके किसी तरह दो जून की रोटी जुटा पाती हैं। 

जामताड़ा के कदमपारा टोला गांव का मामला
मामला जामताड़ा जिले के जामताड़ा प्रखंड अंतर्गत गोपालपुर पंचायत के कदमपारा टोला गांव का है। द फॉलोअप संवाददाता गांव पहुंचे तो पता चला कि मंजू और सुशील की मां 1 साल पहले एक दर्दनाक हादसे में चल बसीं तो वहीं 6 महीने पहले पिता ने भी बीमारी में दम तोड़ दिया। 

आग में झुलसकर हुई थी मां ललिता की मौत
गौरतलब है कि मंजू और सुशील कदमपारा गांव निवासी साहबलाल सोरेन और ललिता मुर्मू के बच्चे हैं। 1 साल पहले ललिता की आग में झुलसकर मौत हो गई थी। परिजनों ने बताया कि ललिता, बच्चों को गोद में लेकर खाना पका रही थीं, तभी उनकी साड़ी में आग लगी और वह गंभीर रूप से झुलस गईं थीं। पत्नी की मौत का साहबलाल सोरेन को गहरा सदमा लगा और वह बीमार पड़ गये। 6 महीने पहले उनकी भी मौत हो गई।

 

7 साल की मंजू 4 वर्षीय भाई का बनीं सहारा
माता-पिता की मौत के बाद महज 7 साल की मंजू को महज 4 साल के सुशील का अभिभावक बनना पड़ा। सुशील की दिनचर्या पूरी तरह से मंजू पर निर्भर है। मंजू, छोटे भाई का खयाल रखने के अलावा घर के कामों में बड़ी मां बालमुनि का हाथ भी बंटाती है। 

सरकारी पहल से बचेगा भाई-बहन का बचपन
बालमुनि ने द फॉलोअप से कहा कि यदि सरकार पहल करे तो इन अनाथ बच्चों का भविष्य सुधर सकता है। बालमुनि को इस बात की चिंता सताती है कि अभी वह हैं तो बच्चों का खयाल रखती हैं, लेकिन उनके बाद क्या होगा। दरअसल, मंजू और सुशील अभी बहुत छोटे हैं। दोनों बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन दस्तावेजों का अभाव आड़े आता है। ग्रामीणों ने सरकार से सहायता की गुहार लगाई है। 
 

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