दीपक कुमार/जामताड़ा:
मोबाइल चोरी के एक मामले का उद्भेदन करते हुए जामताड़ा पुलिस नाबालिग आरोपी की पहचान उजागर करके विवादों में घिर गई है। मामला जामताड़ा एसपी कार्यालय में आयोजित प्रेसवार्ता से जुड़ा है। यहां 18 मई 2026 को जामताड़ा के सुभाष चौक स्थित मोबाइल शॉप से चोरी की घटना का उद्बेदन करते हुए पुलिस ने जो प्रेस विज्ञप्ति जारी की है उसमें नाबालिग आरोपी का नाम और पता सार्वजनिक कर दिया है। दरअसल, किशोर न्याय (बालकों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 74 के तहत पुलिस आरोपी अथवा अपराधी बच्चे की पहचान सार्वजनिक नहीं कर सकती। बच्चे का नाम, तस्वीर, पता या स्कूल की जानकारी उजागर करना गैरकानूनी है क्योंकि इससे बच्चे का भविष्य और उसकी निजता प्रभावित होती है। दोषी पाए जाने पर 6 महीने की जेल और जुर्माने का प्रावधान है।

18 मई 2026 को मोबाइल दुकान में हुई थी चोरी
गौरतलब है कि 18 मई 2026 को जामताड़ा के सुभाष चौक स्थित मोबाइल की दुकान में भीषण चोरी हुई थी। इस मामले को लेकर पुलिस लगातार छापेमारी कर रही थी। शुक्रवार को एसपी कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता के दौरान एसडीपीओ वसीम राजा ने बताया कि पुलिस अधीक्षक (SP) के निर्देश पर गठित टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर देवघर जिले के मार्गोमुंडा थाना क्षेत्र से चोरी में शामिल 1 आरोपी को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर अन्य ठिकानों से चोरी के कुल 8 मोबाइल फोन भी जब्त किए हैं। इस कामयाबी के दौरान जामताड़ा थाना प्रभारी मनोज महतो और इंस्पेक्टर अब्दुल रहमान भी मौजूद थे।
प्रेस वार्ता के दौरान एसडीपीओ ने अपने बयान में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि गिरफ्तार किया गया आरोपी एक नाबालिग (16 वर्ष) है, लेकिन, इसके बाद जारी आधिकारिक विज्ञप्ति (प्रेस नोट) में नाबालिग का नाम, उसकी उम्र और उसका पूरा पता अंकित कर दिया गया।

वरिष्ठ अधिवक्ता ने जताई घोर आपत्ति
नाबालिग की पहचान उजागर होने पर जामताड़ा व्यवहार न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता उमेश कुमार सिंह ने कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने बताया कि "अगर कोई आरोपी कानूनन नाबालिग है, तो किसी भी परिस्थिति में उसका नाम, पता या पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती। ऐसा करना किशोर न्याय अधिनियम (Juvenile Justice Act) का सीधा उल्लंघन और एक गंभीर कानूनी अपराध है।"
तस्वीरें खिंचवाने और जल्दबाजी में प्रेस नोट जारी करने के चक्कर में जामताड़ा पुलिस ने इस संवेदनशील कानून को ताक पर रख दिया। अब देखना यह है कि कानून की रक्षा करने वाली पुलिस की इस बड़ी लापरवाही पर विभाग के उच्च अधिकारी क्या संज्ञान लेते हैं।