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इंटरनेशनल प्लेयर पेट भरने के लिए दिन में चला रहा कैब, रात में फास्ट फूड दुकान में करता है मजदूरी

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सन्नी शारद / द फॉलोअप
झारखंड की पहचान खान और खनिज के साथ-साथ खेल और खिलाड़ियों से भी खूब हुई है। खेल चाहे जो भी हो, झारखंड के खिलाड़ियों ने विश्व स्तर पर उसमें अपनी अलग पहचान बनाई है। अपना पेट काटकर और खेत बेचकर झारखंड के खिलाड़ियों ने राज्य का नाम को रौशन किया। सरकार ने उनकी सफलता का क्रेडिट तो लिया। मगर खिलाड़ियों की स्थिति नहीं बदली। द फॉलोअप लगातार राज्य के ऐसे ही होनहार खिलाड़ियों के संघर्ष की कहानी आपके सामने ला रहा है। ताकि, सत्ता और सिस्टम में बैठे लोगों का ध्यान इस ओर आकृष्ट हो। इस कड़ी में हम आज बात कर रहे हैं थ्रो बॉल के अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी अमरदीप कुमार की। जो भारतीय टीम का नेतृत्व कर चुके हैं। अपनी कप्तानी में झारखंड की नहीं देश का सम्मान बढ़ाने वाले अमरदीप ने कई मेडल भी जीते। मगर गरीबी और तंगहाली से उसका पीछा नहीं छूटा। जिसके कारण उसे पेट भरने के लिए दिन में कैब ड्राइवर तो रात में सड़क के किनारे एक फास्ट फूड की दुकान में मजदूरी करनी पड़ रही है। आइए आपको बताते हैं अमरदीप के संघर्ष की कहानी।

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पिता सड़क किनारे बेचते हैं सब्जी
अंतर्राष्ट्रीय थ्रो-बॉल के खिलाड़ी अमरदीप कुमार मूल रूप से रांची से सटे खूंटी जिला के जरियागढ़ के रहने वाले हैं। मगर उनके पिता रांची के अरगोड़ा चौक के पास सड़क किनारे सब्जी बेचते हैं। गरीबी के कारण वह अमरदीप को अच्छे कॉलेज में नहीं पढ़ा सके। हालांकि, अच्छी लंबाई होने के कारण अमरदीप की रुचि थ्रो बॉल की तरफ बढ़ी। उसके बाद वह धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक खेलें। अमरदीप मलेशिया और नेपाल जाकर भी खेल चुके हैं। वे तीन-तीन गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। अमरदीप भारतीय टीम का कप्तान भी रह चुके हैं।

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मां का कंगन बंधक रखकर गये थे खेलने
अमरदीप ने फॉलोअप से बात करते हुए बताया कि जब वह पहली बार खेलने जा रहे थे तब उनके पास पैसे नहीं थे। तब उन्हें अपनी मां का कंगन बंधक रखना पड़ा था। वह खेलकर और जीतकर इसी उम्मीद के साथ लौटे की उनकी मां का कंगन वापस बंधक से छुड़ा लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। सरकार से भी कोई मदद नहीं मिल पाने के कारण वह अभी तक बंधक ही है। अमरदीप ने बताया कि घर चलाने और मां के कंगन वापस लाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। यहीं वजह है कि कैब चलाने के साथ एक परिचित भैया के फास्ट फूड की दुकान पर मजदूरी करते हैं।

नौकरी के लिए तीन साल तक प्रोजेक्ट भवन में लगाई दौड़
अमरदीप ने बताया कि जब वह गोल्ड मेडल जीतकर लौटे तो उन्हें लगा कि अब उनकी दुनिया बदल जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अमरदीप के अनुसार वह अपने तमाम पेपर के साथ तीन साल तक प्रोजेक्ट भवन का चक्कर लगाते रहे, लेकिन कोई मदद नहीं मिली। उन्हें यही बताया गया कि थ्रो बॉल ओलंपिक खेलों की सूची में शामिल नहीं है। इसलिए सरकार उन्हें मदद नहीं कर पा रही है। हालांकि, अमरदीप का कहना है कि दूसरे राज्य के उनके साथी खिलाड़ियों को वहां की सरकार ने मदद की है।

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