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ममता का आंचल छिन गया, पंचतत्व में विलीन हुईं रूपी सोरेन; फूट-फूटकर रोये सीएम हेमंत

ममता का आंचल छिन गया, पंचतत्व में विलीन हुईं रूपी सोरेन; फूट-फूटकर रोये सीएम हेमंत

सूरज ठाकुर/रांची:

रूपी सोरेन पंचतत्व में विलीन हो गई। जिस नेमरा में पिछले वर्ष सीएम हेमंत सोरेन ने पिता दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मुखाग्नि दी थी, आज वहीं नियति ने उन्हें दोबारा ला खड़ा किया। मां रूपी सोरेन के पार्थिव देह को पवित्र अग्नि के हवाले करते सीएम हेमंत पुन: रो पड़े। महज 1 साल के अंतराल पर पहले पिता और अब मां भी चली गईं। सीएम हेमंत के जीवन से 2 आधार स्तंभों का यूं चले जाना क्रूर किस्मत का परिचायक है। पिता थे तो संबल था। वो चले गये तो मां की ममता की छांव का सहारा था। आज वह भी छिन गया। हेमंत सोरेन प्रदेश के मुखिया हैं। एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के सुप्रीम लीडर हैं। बड़े राजनेता हैं। लेकिन, मां रूपी सोरेन के लिए तो केवल बेटे थे। पीड़ा, पद की मोहताज नहीं होती। कभी मां के पार्थिव देह को निहारते तो कभी जार-बेजार विलाप करते, कभी ढांढ़स बंधाते तो कभी हौसला खोते।

आज झारखंड ने अपने मुख्यमंत्री की भावनाओं का कई रंग देखा। शून्य में निहारतीं उनकी आंखों ने बताया कि हमेशा भीड़ से घिरा रहने वाला शख्स आज मां को अलविदा कहकर कितना अकेला है।

रूपी सोरेन के निधन के बाद बुधवार को एक मुख्यमंत्री ने नहीं, बल्कि बेटे ने लिखा...बाबा के जाने के बाद मां ही मेरी सबसे बड़ी छांव थी। आज वह छांव भी प्रकृति की गोद में समा गईं। आखिर में उन्होंने केवल इतना लिखा. मां। और क्या लिखते। क्या कहते। इस दुनिया में मां से बड़ा कोई शब्द भी बना है क्या। दुख था तो साझा करने को मां थीं। खुशी हुई तो बांटने को मां थीं। जीवन के जेठ ने तपाया तो मां की ममता का आंचल था। टूटा हौसला कभी तो मां का दिया संबल था। मां थी तो खुशियां थी। मां थी तो दुनिया थी। हिल व्यू अस्पताल से लेकर मोरहाबादी में गुरुजी के आवास तक और फिर नेमरा में पैतृक मकान तक।

सीएम हेमंत की उदास आंखों ने कह दिया कि मां का चले जाना दुनिया की कितनी दुखद प्रक्रिया है। पद, पदवी, प्रतिष्ठा और पावर। कुछ भी नहीं। रांची के मोरहाबादी से रामगढ़ के नेमरा तक, सफेद कुर्ता पहने हेमंत सोरेन का निस्तेज चेहरा मां रूपी के चले जाने का दर्द बयां करता रहा। 

ये तस्वीर शायद देखी होगी आपने। सामने मां रूपी की पार्थिव देह रखी है। सामने हेमंत सोरेन किसी अबोध बालक की तरह फूट-फूटकर रो रहे हैं। कोई सांत्वना, कोई ढांढ़स, कोई समझाइश काम नहीं आई। हेमंत सोरेन रोते रहे। दरअसल, यहां मुख्यमंत्री थे ही नहीं। यहां मां रूपी सोरेन का लाडला खड़ा था। छुटपन में कभी रोये तो मां ने खिलौने देकर फुसला लिया था। बाहों में उठा लिया था, गोद में सुला लिया था। सिर पर थपकियां दी थीं।

हेमंत सोरेन आज भी रोये, लेकिन सिर पर कोई हाथ नहीं था। मां का आंचल नहीं थी। वात्सल्य वाली गोद नहीं थी। सीएम जानते हैं कि कोई मीठी आवाज नहीं आयेगी जो पूछे, क्या हुआ हेमंत। क्यों रो रहे हो। क्या चाहिये। शायद इसलिए मुख्यमंत्री और भी ज्यादा रोये। जो था, अब कभी नहीं होगा। सब होंगे पर मां रूपी नहीं होंगी। उनकी गोद नहीं होगी। उनका आंचल नहीं होगा। उनका वात्सल्य नहीं होगा। 

मां चली गईं। बेटा रो रहा है। इस तस्वीर की यही दुखद सच्चाई है। भीड़ तो देखिए कितनी है। कोई सीएम हेमंत से पूछे तो शायद कहेंगे। बाबा चले गये। मां नहीं रहीं। मैं बिलकुल अकेला हूं। 

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