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बैंकों से CM हेमंत सोरेन की अपील : मानकी, मुंडा, प्रधान और मुखिया के लिए हो बीमा योजना, आर्थिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाएं

 मानकी, मुंडा, प्रधान और मुखिया के लिए हो बीमा योजना, आर्थिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाएं

रांची
झारखंड के मानकी (Manki), मुंडा (Munda), प्रधान (Pradhan) और मुखिया (Mukhiya) जैसे परंपरागत व्यवस्था (Traditional System) से जुड़े लोगों को भी आर्थिक सुरक्षा (Financial Security) देने के लिए बीमा योजना (Insurance Scheme) बनाने पर विचार होना चाहिए। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन (Hemant Soren) ने बैंकों (Banks) से यह अपील की है। उन्होंने कहा कि राज्य (State) में ऐसे कई लोग हैं, जो सामाजिक व्यवस्था (Social System) को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका (Important Role) निभाते हैं, लेकिन उन्हें सरकार (Government) की ओर से नियमित वेतन (Regular Salary) नहीं मिलता। ऐसे लोगों के भविष्य की सुरक्षा (Future Security) के लिए बैंक (Banks) आगे आएं। मुख्यमंत्री बुधवार को प्रोजेक्ट भवन (Project Bhawan) में झारखंड सरकार (Jharkhand Government) और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया (Union Bank of India) के बीच हुए समझौता ज्ञापन (Memorandum of Understanding-MoU) समारोह को संबोधित कर रहे थे।

झारखंड के हर नागरिक को विपत्ति के समय आर्थिक सहायता मिले

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार का प्रयास है कि झारखंड के हर नागरिक को विपत्ति के समय आर्थिक सहायता मिल सके। फिलहाल विभिन्न बैंकों के सहयोग से सरकारी कर्मचारियों को आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराने की पहल की जा रही है। सरकार चाहती है कि इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाकर उन लोगों तक भी पहुंचाया जाए, जिन्हें सरकार की ओर से वेतन नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के बीच हुआ समझौता इसी दिशा में एक कदम है। इसके तहत विभिन्न विभागों और अलग-अलग स्थानों पर कार्यरत कर्मचारियों को विपरीत परिस्थितियों में आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। पिछले करीब डेढ़ साल से इस तरह की पहल की जा रही है। एसबीआई (SBI), पीएनबी (PNB), बैंक ऑफ इंडिया (Bank of India) के बाद अब यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के साथ भी समझौता किया गया है। मुख्यमंत्री ने बताया कि मोटे तौर पर चार-पांच बैंकों ने मिलकर राज्य के करीब पौने दो लाख कर्मचारियों को विपत्ति के समय साथ खड़े रहने का भरोसा दिया है। उन्होंने इस सहयोग के लिए सभी बैंकों के पदाधिकारियों और सदस्यों का आभार जताया।


सरकारी कर्मचारियों से आगे बढ़े आर्थिक सुरक्षा का दायरा
हेमंत सोरेन ने कहा कि सरकार की मंशा राज्य के प्रत्येक नागरिक को विपत्ति के समय सहायता उपलब्ध कराने की है। इस दिशा में लगातार चिंतन-मंथन हो रहा है और कई कार्ययोजनाएं भी तैयार की जा रही हैं। हेल्थ इंश्योरेंस (Health Insurance) जैसी योजनाओं के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को आर्थिक सुरक्षा देने और उनका भविष्य सुरक्षित करने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि एक साथ सारी चीजों को बदला नहीं जा सकता, लेकिन छोटे-छोटे प्रयासों से निश्चित रूप से बदलाव लाया जा सकता है। झारखंड एक छोटा राज्य है और यहां की जनसंख्या भी बहुत अधिक नहीं है। ऐसे में सभी लोगों को एक बड़ी संस्था के रूप में थोड़ी छांव और सुरक्षा उपलब्ध कराई जा सकती है। मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान समझौते का लाभ मुख्य रूप से उन लोगों को मिलेगा, जिनके बैंक खातों में सरकार की ओर से वेतन जाता है। लेकिन राज्य में कई ऐसे लोग भी हैं, जो सरकार के अभिन्न अंग के रूप में अपनी भूमिका निभाते हैं और उन्हें सरकार की ओर से बहुत अधिक सहयोग नहीं मिल पाता। भविष्य में ऐसे लोगों को भी इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ने पर विचार किया जाना चाहिए।


मानकी, मुंडा और प्रधान जैसे लोगों के लिए भी बने बीमा योजना
मुख्यमंत्री ने झारखंड की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि यह आदिवासी बहुल राज्य है, जहां कई परंपरागत और रूढ़िगत व्यवस्थाएं आज भी विद्यमान हैं। राज्य में मानकी, मुंडा, कुड़मी, परगनैत और मुखिया जैसी व्यवस्थाओं से जुड़े लोग सामाजिक ताने-बाने को संचालित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि देश की आजादी से पहले ही आदिवासी समुदाय के लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था। भगवान बिरसा मुंडा और सिद्धू-कान्हू जैसे महापुरुषों ने इस लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह वर्ग भले ही आर्थिक और शैक्षणिक रूप से कमजोर हो, लेकिन इनके हौसले बहुत बुलंद हैं। हेमंत सोरेन ने बैंकों के प्रतिनिधियों से सवाल किया कि मानकी, मुंडा और प्रधान जैसे लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है। ऐसे में क्या इनकी भविष्य की सुरक्षा के लिए कोई विशेष व्यवस्था नहीं की जा सकती? जिन लोगों को हर महीने हजारों या लाखों रुपये का वेतन नहीं मिलता, क्या उनके लिए भी कोई बीमा योजना शुरू नहीं हो सकती? उन्होंने मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना (Mukhyamantri Maiya Samman Yojana) की लाभुक महिलाओं का उल्लेख करते हुए पूछा कि क्या उनके लिए भी कोई विशेष बीमा योजना नहीं बनाई जा सकती? मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह के छोटे-छोटे प्रयासों से गरीबों, जरूरतमंद बच्चों और नौजवानों को अपने पैरों पर खड़ा करने में मदद मिल सकती है।


हर घर और परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत करना सरकार का लक्ष्य
मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड अपने आर्थिक संसाधनों को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा में रहता है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर आर्थिक विषमता के मामले में दूसरे राज्यों की तुलना में थोड़ा पीछे है। राज्य सरकार का हमेशा प्रयास रहा है कि हर घर और हर परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो।
उन्होंने मंईयां सम्मान योजना का जिक्र करते हुए कहा कि यह देश में अपने तरीके की अनोखी योजनाओं में से एक है। पिछले तीन वर्षों से बिना रुके यह योजना सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में अंतिम व्यक्ति तक महिलाओं को लाभ पहुंचा रही है। अब इसका प्रभाव धीरे-धीरे बड़े स्तर पर दिखाई देने लगा है।
उन्होंने कहा कि कई बार बड़ी-बड़ी योजनाओं को लागू करने के बावजूद अपेक्षित सफलता नहीं मिलती, जबकि छोटी-छोटी योजनाएं भी अपनी अलग पहचान बना लेती हैं। ऐसी योजनाओं को प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए।


बैंकों के आंकड़े अच्छे, लेकिन जमीनी हकीकत देखकर होती है निराशा
सीएम ने राज्य में बैंकिंग व्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों में बैंकों की भूमिका पर भी अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (SLBC) की बैठकें होती हैं। राज्य में कई बैंक काम कर रहे हैं और लेंडिंग रेशियो (Lending Ratio) के आंकड़े भी सामने आते हैं। कागजों पर ये आंकड़े काफी अच्छे दिखाई देते हैं, लेकिन जब वे क्षेत्र के दौरे पर निकलते हैं तो जमीनी स्थिति देखकर खुशी कम और निराशा अधिक होती है।
उन्होंने बैंकों के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा, "मैं पहले भी कहता हूं कि बैंक वाले लोग शायद मेरी बातों को अपने-अपने तरीके से लेते हों। जब हमें कोई बैंक मदद करेगा ही नहीं, तो मैं बैंक में पैसा रखूंगा ही क्यों? मैं पॉलिथीन में भरकर अपने घर में गाड़कर रखूंगा।" मुख्यमंत्री ने कहा कि यह समझने की जरूरत है कि राज्य के आदिवासी समुदायों के साथ बैंकों का सहयोग किस तरह का है। बैंकों को झारखंड में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के साथ यहां के मूल निवासियों को बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने के लिए भी विशेष प्रयास करना चाहिए।


सिर्फ वेतन पाने वालों तक सीमित नहीं रहे बैंकिंग सहयोग
हेमंत सोरेन ने कहा कि सरकार और बैंक कई नियमों और कानूनों से बंधे होते हैं, लेकिन उन लोगों के लिए भी रास्ते तलाशने चाहिए, जिन्हें नियमित वेतन नहीं मिलता। सरकार को केवल उन्हीं लोगों के बारे में नहीं सोचना चाहिए, जिन्हें वह तनख्वाह देती है, बल्कि उन लोगों की आर्थिक सुरक्षा पर भी ध्यान देना चाहिए, जो अलग-अलग स्तर पर सरकार और समाज की व्यवस्था का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि गरीबों, बच्चों और नौजवानों को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए सरकार अलग-अलग स्तर पर प्रयास कर रही है। कुछ बैंकों को साथ लेकर और कुछ जिम्मेदारियां अपने स्तर पर उठाकर सरकार उनके साथ खड़ी होती है। सोरेन ने बैंकों से सहयोग का दायरा बढ़ाने और इस विषय पर व्यापक चर्चा करने की अपील की। उन्होंने कहा कि राज्य के आम लोगों के प्रति सरकार और बैंकों की क्या जिम्मेदारी होनी चाहिए, इस पर मिलकर काम करने से झारखंड के लिए बेहतर परिणाम सामने आ सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आज के समझौता कार्यक्रम में सभी लोगों ने एक मजबूत कदम उठाया है। जरूरत इस बात की है कि इस पहल को और आगे बढ़ाया जाए, ताकि बड़े पैमाने पर लोगों को आर्थिक सुरक्षा और सहायता उपलब्ध कराई जा सके।


 

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