रवीन्द्रनाथ टैगोर, विवेकानंद, गांधी और भगतसिंह वगैरह आपस में बौद्धिक जिरह नहीं कर पाए।
‘जमाते-इस्लामी' को यह बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है कि दुर्गा-पूजा के नाम पर बांग्लादेश में हजारों पंडाल सजाए जाएं।
हताशा की हालत में भी गांधी घटनाओं से निरपेक्ष लेकिन जीवनमूल्यों की अपनी प्रतिबद्धता से सापेक्ष रहकर कालजयी नायकों जैसा बर्ताव करते हैं।
1937 में सावरकर ने द्विराष्ट्र सिद्धांत की स्पष्ट सार्वजनिक अभिव्यक्ति की
दशहरा और गांव-देहात के मेले
गांधी क्लास को थर्ड क्लास का समानार्थी कहता हिकरत भरा एक अज्ञानी जुमला गांधी पर चस्पा कर दिया जाता है।
'यह स्त्री को पुरुष की वस्तु या संपति समझने की घृणित मानसिकता है।
गांधी का रचनात्मक कार्यक्रम देश के कोई काम नहीं आया। उनका ब्रह्मचर्य देश में बलात्कार से हार रहा है। उनकी अहिंसा नक्सलवाद और पुलिसिया बर्बरता से पिटकर भी जीवित रहना चाहती है।
उन्नीसवीं सदी में पत्रकार विज़िटिंग कार्ड का इस्तमाल करने लगे थे। पत्रकारों को ब्रिटिश हुकूमत के कार्यक्रमों और निजी पार्टियों में बुलाया जाने लगा था।
गांधी पाठशाला में गांधी से मुठभेड़
'जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। मां की महिमा अनंत है।
दुनिया की लगभग सभी संस्कृतियों में विपत्ति की घड़ी में देवी -देवताओं के आगे नतमस्तक होकर उनकी स्तुतियां गाने, रोने-गिड़गिड़ाने और दया की भीख मांगने की परंपरा रही है।