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नन्ही गोरैया को बचा रहे हैं केबीसी में पांच करोड़ जीतने वाले सुशील कुमार, ऐसी है उनकी मुहिम

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द फॉलोअप टीम, पटना: 
विलुप्तप्राय पक्षियों की श्रेणी में शामिल हो चुकी गोरैया के संरक्षण के लिये 20 मार्च का दिन गोरैया को समर्पित है। इस दिन विश्व गोरैया दिवस मनाया जाता है। विभिन्न जागरूकता कार्यक्रम चलाये जाते हैं। कौन बनेगा करोड़पति के पहले पांच करोड़ रुपये के विजेता और बिहार इलेक्शन कमिशन के ब्रांड एंबेसडर रह चुके पुर्वी चंपारण के सुशील कुमार गोरैया के सरंक्षण के लिये अभियान चला रहे हैं। 



केबीसी वाले सुनील कुमार का सराहनीय प्रयास
सुशील कुमार गोरैया के संरक्षण और बचाव के लिये बीते कई वर्षों से काम कर रहे हैं। वे आसपास के लोगों को गोरैया संरक्षण के प्रति जागरूक करते हैं। लोगों के बताते हैं कि इनका संरक्षण कैसे किया जा सकता है। खुद के इनिशियेटिव से गोरैया के लिये घोंसला बनाते हैं और लोगों के बीच वितरित भी करते हैं। लोगों से खुद भी ऐसा करने के लिये कहते हैं। वे जागरूकता अभियान के तहत लोगों से अपील करते हैं कि वे अपने घर की मुंडेर पर गोरैया के लिये पीने का पानी और दाना जरूर रखें। वे लोगों से कहते हैं कि घोंसले वैसे स्थानों पर लगाएं जहां कोई जानवर या सांप ना पहुंच सके। गोरैया को चावल के छोटे-छोटे दाने और धान की बाली खाने को दें। उनके लिये पानी भी रखें। सुशील केवल लोगों को कहते ही नहीं बल्कि खुद भी घोंसला बनाकर लोगों के बीच वितरित करते हैं। लोगों से मिलते हैं और गोरैया के संरक्षण की जरूरतों और महत्ता से अवगत कराते हैं। उनके प्रयास से इलाके में कई लोगों ने ये काम भी किया है। 



20 मार्च 2019 को शुरू हुआ था गोरैया बचाओ अभियान
गोरैया के संरक्षण के लिये प्रयासों को लेकर द फॉलोअप ने सुशील कुमार से बातचीत की। सुशील बताते हैं कि ये सिलसिला 20 मार्च 2019 से शुरू हुआ। सुशील को गोरैया संरक्षण की प्रेरणा पटना पीआईबी में काम करने वाले अपने एक मित्र से मिली। सुनील बताते हैं कि उनके मित्र संजय कुमार रोजोना अपने फेसबुक पर गोरैया की तस्वीरें डालते। 


सुशील ने अपने घर की बालकनी में घोंसला बना रखा था जहां गोरैया के लिये खाना और पानी रखा जाता। वहां गोरैया आतीं। दाना चुगतीं, पानी पीतीं। सुशील कहते हैं कि उन्हें ये काफी अच्छा लगा। उन्होंने इसी से प्रेरित होकर मुहिम छेड़ दी। वे खुद लोगों के यहां घोंसला लगाने लगे। सुशील अपने पैसों से घोंसले बनवाते हैं और फिर लोगों के यहां जाकर लगाते हैं। वे कहते हैं कि फिलहाल वे अपने जिले में ही ये मुहिम चला रहे हैं। कभी खुद तो कभी लोगों के अनुरोध पर घोंसला बनवाकर बांटते हैं। वे मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि जहां तक उनकी स्कूटी जाती है, उनके अभियान का दायरा वहां तक है। कभी-कभी किसी कार्यक्रम के सिलसिले में किसी दूसरे जिले में जाना होता है तो अपने साथ कुछ घोंसले भी ले जाते हैं। वहां जो लोग इच्छुक होते हैं उन्हें घोंसला देते हैं। 

सुशील की अपील पर व्यवसायियों ने बांटा घोंसला
सुशील कहते हैं कि पहले जब लोग घर बनाते थे तो वहां हर किसी के लिये जगह होती थी। तब लोग गोरैया के लिये मुंडेरों पर पानी रखा करते थे। गांव में तालाब और नदिया सहित कई जलस्त्रोत होते थे लेकिन अब इनकी संख्या या तो कम हो गयी है या खत्म हो गयी है। जलस्त्रोत कम हो गये हैं। गोरैया की खासियत होती है कि वो केवल साफ पानी पीती है। जलस्त्रोत कम होने की वजह से गोरैया के नहाने और पीने के पानी के लिये मुश्किल हो गयी है। गोरैया गर्मी बर्दाश्त नहीं कर पाती और मर जाती हैं। जरूरी है कि हम गोरैया को आवास और पानी का स्त्रोत मुहैया करायें ताकि उनकी जिंदगी बचाई जा सके। 
सुशील कहते हैं कि गोरैया संरक्षण के अभियान को 2 साल बीत गये। वे अपने खर्चे पर ये काम करते हैं। कभी-कभी किसी से मदद मिल जाती है। उन्होंने बताया कि गोरैया दिवस के मौके पर उन्होंने शहर के व्यवसायियों से अपील की थी कि वे अपने ग्राहकों को एक-एक घोंसला मुफ्त में दें। व्यवसायियों ने उनकी बात मानी और ग्राहकों को घोंसला बांटा। इस तरह से ये अभियान बड़ा होता जा रहा है। 

20 मार्च 2010 से गोरैया दिवस मनाने की शुरुआत
गौरतलब है कि 20 मार्च 2010 से विश्व गोरैया दिवस मनाने की शुरुआत हुई थी। दरअसल, गोरैया ऐसी पक्षी है जो इंसानों के सबसे करीब होती है। वे हानिकारक कीट पतंगों को खाकर इंसानों की सहायता करती है। खेतों में भी हानिकारक जीव-जंतुओं को अपना आहार बनाकर किसानों की मदद करती है। लेकिन बढ़ती आबादी, अंधाधुंध शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और खास तौर पर मोबाइल टावरों की बढती संख्या की वजह से गोरैया की संख्या में तेजी से कमी आई है। कमी आई है ऐसा कहना पूरी तरह सही नहीं होगा बल्कि ये कहना सही होगा कि उनके अस्तित्व पर ही खतरा मंडराने लगा है। उनके संरक्षण की जरूरत है।