द फाॅलोअप टीम, पटना :
सरकारी आंकड़े और दावे चाहे जो कहें लेकिन सच तो यही है कि बिहार में कोरोना के खौफ ने वोट प्रतिशत को बुरी तरह प्रभावित किया है। बीते दिन 94 सीटों पर चुनाव कराया गया। इन सीटों पर वोट का प्रतिशत यह साबित कर रहा है कि बिहार के मतदाता बुरी तहर कोरोना से डरे हुए हैं। इसका असर वोट पर देखने को मिला। जानकारों की माने तो अगले और अंतिम चरण के चुनाव में भी लगभग इसी प्रकार की स्थिति रहने वाली है। इसका असर चुनाव परिणाम पर भी पड़ेगा।
बिहार विधानसभा चुनाव के दूसरे फेज में मात्र 53.98 प्रतिशत वोटिंग हो पायी। कोरोना का खौफ जिनके अंदर नहीं था, वही वोट देने निकले। जो कोरोना का खतरा देख-पढ़ चुके हैं वे मतदाता वोट देने नहीं गए। पटना में कोरोना का सबसे ज्यादा असर था और अब भी है। कोई दिन नहीं गुजरता जब आधा दर्जन मौत न हो। सरकारी सिस्टम आंकड़े छिपा सकता है लेकिन जनता के बीच का सच नहीं छिप सकता। यही कारण है कि पटना में मतदान का सबसे खराब हाल दिखा। जिस बांकीपुर सीट पर जीत-हार का अंतर पूरे बिहार में किसी प्रत्याशी के कुल वोट से अधिक होता था, वहां महज 35.9 प्रतिशत वोटिंग हुई। बख्तियारपुर, फतुहा, मनेर जैसे इलाकों में वोटर निकले, क्योंकि उन्हें कोरोना से खौफ नहीं था। शहरी इलाकों में बूथ के लिए नहीं निकलने वाले जिद पर रहे कि कोरोना में मरने तो नहीं जाएंगे। प्रषासन और चुनाव आयोग की आरजू-मिन्नत सब बेकार गया। वैसे, दूसरा फेज तो झांकी है। तिरहुत-कोसी समेत तीसरे फेज की 78 सीटें अभी बाकी हैं। अनुमान यह है कि यहां भी वही स्थिति रहने वाली है। अभी तो केवल कोरोना का डर था अब बाढ़ और बारिष का खतरा भी इन सीटों पर देखने को मिलेगा।
वोट प्रतिशत की चिंता किसी को नहीं
कोरोना महामारी की चिंता किसी दल को तो पहले से नहीं थी लेकिन वोट प्रतिषत बढ़ाने की चिंता भी किसी दल के नेताओं ने नहीं की। ये नेता महज प्रचार और अपने-अपने समर्थकों को एकत्रित करने में ही लगे रहे। जदयू को इस महापर्व को समय पर कराने की चिंता थी। राजद विरोध में था भी और नहीं भी। कांग्रेस की भी यही स्थिति थी। भाजपा के अंदर से आवाज आती रही कि अभी टले, लेकिन नीतीश विरोध से बचने के लिए बाहरी तौर पर बोलने से परहेज था। अगर जनता को बचाने के लिए भाजपा खड़ी होती तो देश पर राज कर रही इसी पार्टी को शायद वोट प्रतिशत के रूप में फायदा मिलता। पहले चरण के आंकड़ों से खुश होने की जरूरत नहीं, क्योंकि दूसरे चरण ने कोरोना का खौफ साफ दिखा दिया। उन घरों से लोग बिल्कुल नहीं निकले, जिसका किसी-न-किसी रूप में कोरोना से साक्षात्कार हुआ था। तीसरे चरण में बारिश-बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित रहे इलाकों में चुनाव है। इसलिए, सिरदर्द अभी तो है। दैनिक भास्कर ने तो चुनाव की घोषणा से पहले ही बता दिया था कि वोट प्रतिशत धड़ाम होगा। पिछली बार की तरह 56 प्रतिशत तो नहीं ही जाएगा।
वोट की कमी का असर तो पड़ेगा
पहले फेज में 55.69 प्रतिशत मतदान से निर्वाचन आयोग अपने निर्णय पर पीठ ठोक रहा था। अब उसे जवाब देना चाहिए। किसी के पक्ष में लहर जैसी कोई बात तो नहीं दिखती है। असल सवाल पर आएं कि वोट के अभाव का प्रभाव किसपर पड़ेगा? दरअसल, इसके लिए थर्मामीटर की जरूरत नहीं। बस, यह समझिए कि निकले वोटर आखिर होंगे किनके। कोरोना ने नुकसान हर वर्ग-तबके का किया, लेकिन ग्रामीण इलाकों के लोगों और अपेक्षाकृत कम जागरूक-पढ़े लोग बेखौफ वोट देने निकले। लॉकडाउन और इससे उपजी बेरोजगारी से परेशान लोग गुस्से में वोट देने निकले। जाति-समाज को ध्यान में रखने वाले ज्यादा निकले। इसलिए इसका ज्यादा खामियाजा भाजपा जैसी मध्यमवर्गीय पार्टी को ही भुगतना पड़ सकता है।
परिवर्तन तय मान लेना चाहिए
अंतिम फेज से बहुत उम्मीद करना बेकार है। मतलब, एक तरह से फरवरी 2005 जैसा कुछ होना तय है। बिहार में 15 साल पर सत्ता परिवर्तन का योग देखने को मिलता रहा है। इस बार भी कुछ ऐसा ही संयोग दिख रहा है। जिस प्रकार की संभावनाएं आकार ले रहे है उसमें परिवर्तन तय माना लेना चाहिए।