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सत्ता और सचिवालय का सच : मोटा भाई के सोंटे का असर

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जीतेंद्र कुमार

विश्व की सबसे बड़ी पार्टी में कहा जाता है कि दिल्ली की सर्दी में भी गर्मी ला देती है भाई की तिरछी निगाहें। पिछले दिनों पार्टी के आठ नेताओं को अचानक दिल्ली तलब किया गया। बुलावा ऐसा कि टिकट कटने का नहीं, लेकिन राजनीतिक भविष्य का तापमान जरूर नाप लिया गया। बताते हैं, बैठक में मोटा भाई ने प्रदेश के कुछ स्वनामधन्य मुख्यमंत्रियों को ऐसा राजनीतिक पाठ पढ़ाया कि अब उसकी असर व्यवहार में दिखने लगा है। संदेश साफ था—पहले राज्य में सत्ता हासिल कीजिए, फिर मुख्यमंत्री बनने के सपने देखिए। कुर्सी के लिए आपस में खींचतान बाद में कर लीजिएगा, पहले कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता तो साफ कर लीजिए। यानी पार्टी में ‘मैं बड़ा या तू बड़ा’ का खेल बंद और ‘पहले पार्टी, फिर पद’ वाला अध्याय शुरू हो।


मोटा भाई की भौंह छात्र आंदोलन पर भी तन गई। प्रदेश के नेताओं के आंदोलन में खुलेआम कूदने पर नाराजगी जताई गई। संदेश यह था कि राजनीति में हर जगह खुद मंच पर चढ़ना जरूरी नहीं होता। कुछ काम पर्दे के पीछे भी बड़े सलीके से किए जाते हैं। बताया गया कि छात्रों को कानूनी लड़ाई में मदद पहुंचाई जा सकती है, कोर्ट-कचहरी में साथ खड़ा हुआ जा सकता है, लेकिन आंदोलन में सीधे कूदकर झंडा उठाना शायद रणनीति की किताब में दर्ज नहीं था। ऊपर से आंदोलन जल्दी खत्म हो गया, सो अलग। अब नेताओं को 15 सितंबर के बाद की तैयारी में जुटने की हिदायत मिली है। मतलब अगली पारी का होमवर्क मिल गया है।


एमएमडीआरए बिल पर भी नेताओं को समझाया गया कि राजनीति सिर्फ बयानबाजी से नहीं चलती, कभी-कभी उसके पीछे अर्थव्यवस्था भी खड़ी होती है। झामुमो की आर्थिक नाकेबंदी की चेतावनी का जिक्र हुआ तो नेताओं को जनता के बीच जाकर समझाने-बुझाने की सलाह दी गई।
बताते हैं कि संभावित केंद्रीय कार्रवाई का संकेत भी दे दिया गया। संदेश सीधा था—अगर कोयले की सप्लाई रोकने की कोशिश हुई तो केंद्र भी हाथ पर हाथ रखकर बैठने वाला नहीं है। यानी इधर नाकेबंदी का ऐलान और उधर दिल्ली से ‘एक्शन’ का अलार्म! शायद यही वजह है कि आर्थिक नाकेबंदी वाला सुर अब पहले की तुलना में कुछ धीमा सुनाई पड़ रहा है। एक दिन का विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर केंद्र को संदेश देने की जो तैयारी थी, उसकी आवाज भी फिलहाल मद्धिम पड़ती दिख रही है। अब देखना दिलचस्प होगा कि मोटा भाई के सोंटे का असर कितने दिन रहता है और प्रदेश की राजनीति में फिर से कौन सी नयी रणनीति दिखती है।

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