द फॉलोअप डेस्क
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने ब्रह्मपुत्र घाटी में रहने वाले लोगों से - जिनमें देश के दूसरे हिस्सों से आकर राज्य में बसे लोग भी शामिल हैं- जनगणना में असमिया को अपनी मातृभाषा के तौर पर दर्ज कराने की अपील की। गुवाहाटी में लोक सेवा भवन में प्रेस से बात करते हुए सरमा ने कहा कि उन्होंने 15 अगस्त को खास तौर पर उन लोगों से यह अपील की थी जो दूसरे राज्यों से असम आए हैं और दशकों से राज्य में रह रहे हैं। उन्होंने कहा, "आने वाली जनगणना 2027 इन लोगों के लिए असम की पहचान के साथ घुल-मिल जाने का मौका लेकर आई है।" उन्होंने साफ किया कि इस अपील में बराक घाटी के निवासी और मूल समुदाय शामिल नहीं हैं।

मूल समुदायों को जोड़ने वाली "संपर्क भाषा" भी बताया
सरमा ने असमिया को राज्य भर के अलग-अलग मूल समुदायों को जोड़ने वाली "संपर्क भाषा" (लिंक लैंग्वेज) भी बताया। उन्होंने कहा, "अगर मैं बोरो, मिसिंग या राभा समुदाय के किसी व्यक्ति से बात करता हूं, तो मैं असमिया में बात करूंगा। इसलिए मुझे असमिया भाषा के भविष्य की चिंता नहीं है और न ही इस बात की चिंता है कि कोई भाषा को लेकर हमें ब्लैकमेल करेगा। लेकिन इस जनगणना ने एक नया, व्यापक सामूहिक समुदाय बनाने का मौका दिया है।" मुख्यमंत्री ने कहा कि यह अपील खास तौर पर निचले असम (लोअर असम) के उन इलाकों के लिए अहम है, जहां अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमि के लोग सालों से बसे हुए हैं।
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यह मुख्य रूप से निचले असम के लिए है
उन्होंने कहा, "यह मुख्य रूप से निचले असम के लिए है। हर जिले में इसकी ज़रूरत नहीं है। जोरहाट में ऐसा कानून लाने की कोई वजह नहीं है क्योंकि वहां हर कोई असमिया है।" उन्होंने कहा कि सरकार निचले असम के चुनिंदा राजस्व क्षेत्रों (रेवेन्यू सर्कल्स), खासकर धुबरी, बारपेटा और गोलपारा पर ध्यान देगी। सरमा ने इस प्रक्रिया को संवेदनशील इलाकों में ज़मीन बचाने की ज़रूरत से भी जोड़ा। उन्होंने कहा, "वहां जितनी ज़मीन है, उसे बचाने की ज़रूरत है।"

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