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आंधी बारिश में लगता है डर : झोंपड़ीनुमा घर में मासूम बच्चों संग रहने को विवश शोभा-छोटी, सरकारी पक्का मकान मिल जाता तो...

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मेहरमा/गोड्डा:

आपकी स्क्रीन पर नजर आ रहा ये कोई खंडहर नहीं, बल्कि किसी का आशियाना है। कच्ची मिट्टी की दीवारें दरक चुकी हैं। छप्पर उघड़ चुका है। खिड़की और दरवाजे के नाम पर पुरानी साड़ी और मैली-कुचैली धोती का पर्दा है। मानसून की आंधी-बारिश में ये झोंपड़ीनुमा मकान कब जमींदोज हो जाएंगे, पता नहीं। तेज हवा में खपरैल की छत बस अभी उड़ जाने को होती है। शोभा और छोटी अपने मासूम बच्चों को लेकर इन्हीं कच्ची मिट्टी के झोंपड़ीनुमा मकान में रहती है। बच्चे तो सो जाते हैं, लेकिन शोभा और छोटी की आंखें रतजगा करती हैं क्योंकि आंधी-बारिश के साथ जब बिजली कड़कती है तो इनका कलेजा दहल जाता है। मन में बस यही खयाल आता है कि पता नहीं, इस रात की सुबह देख पाएंगी या नहीं। कभी भी मिट्टी की दीवारें ढह सकती है। किसी भी पल खपरैल की टूटी-फूटी छत इन कमजोर दीवारों का साथ छोड़ सकती है। शोभा और छोटी का परिवार किसी भी पल अनहोनी का शिकार हो सकता है।

मेहरमा प्रखंड के भैरोनगर गांव का मामला
तस्वीरें संताल परगना प्रमंडल अंतर्गत गोड्डा जिला के मेहरमा प्रखंड की धनकुड़िया पंचायत के भैरोनगर गांव की है। यहां छोटी और शोभा का परिवार पिछले करीब 3 दशक से यूं ही सरकारी जमीन पर झोंपड़ीनुमा कच्चे मकान में रहता आ रहा है। बारिश के मौसम में खपरैल की छत टपकती है दीवारें दरकने लगती हैं। तेज हवा ऐसा आभास देती है कि बस अभी इनका आशियाना उड़ा ले जाएगी। छत से टपकती पानी की बूंदें इन्हें भिगाती हैं और ठंड सोने नहीं देती। हालात, ऐसे हैं कि कई बार मूसलाधार बारिश के बीच परिवार को सरकारी पंडाल की छत के नीचे रात गुजारनी पड़ती है। आशियाना टूटता है और फिर उसे समेटना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि शोभा और छोटी के परिवार का नाम सरकारी आवास योजना के लाभुकों की सूची में नहीं आया, लेकिन मुखिया आवास आवंटित करने के एवज में रिश्वत मांगता है...

मुखिया पर 25 हजार रिश्वत मांगने का आरोप
शोभा और छोटी के परिवार की शिकायत है कि कई बार उनका नाम सरकारी आवास के लाभुकों की सूची में आया, लेकिन घर कभी नहीं बना। इनका आरोप है कि स्थानीय मुखिया ने आवास आवंटित करने के एवज में 20-25 हजार रुपये की रिश्वत मांगी। मुखिया का तर्क है कि आवास योजना का लाभ दिलाने के लिए उसे काफी भागदौड़ करनी पड़ती है, जिसके एवज में पैसा लगता है। इनका कहना है कि जो परिवार इस खंडहरनुमा घर में किसी तरह रात काटता है। जो पूरे दिन की दिहाड़ी के बाद बमुश्किल दो जून की रोटी जुटा पाता है। वह भला 20 हजार रुपये की बड़ी रकम कहां लाएगा। रिश्वत का जुगाड़ नहीं हुआ तो मकान भी नहीं बना।

भूमिहीन है शोभा और छोटी कुमारी का परिवार
गौरतलब है कि शोभा और छोटी कुमारी भूमिहीन हैं। इनके पास अपनी जमीन नहीं है। वर्षों से दोनों परिवार सरकारी भूमि पर झोंपड़ीनुमा मकान बनाकर रहता आ रहा है। परिवार का दावा है कि वे लोग करीब 30 साल से इस गांव में रहते आ रहे हैं। इनकी मांग है कि यदि एक अदद सरकारी आवास मिल जाता तो बड़ी राहत मिलती। कम से कम मासूम नौनिहालों का जीवन सुरक्षित हो जाता। 


 

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