द फॉलोअप डेस्क
झारखंड में अब निजी संस्थान इंजीनियरिंग, मेडिकल व मैनेजमेंट सहित अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के लिए मनमानी फीस नहीं वसूल सकेंगे। इसके लिए आज झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र में झारखंड व्यवसायिक शिक्षण संस्थान (शुल्क विनियमन)विधेयक 2025 ध्वनि मत से पारित हो गया। भाजपा विधायक नवीन जायसवाल और राज सिन्हा के विरोध और सुझावों का उच्च एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने सटीक जवाब देकर उन्हें चुप करा दिया। हालांकि विधेयक के कई प्रावधानों पर विपक्ष की आपत्ति थी। लेकिन इन आपत्तियों के बीच सदन ने इस विधेयक को पारित कर दिया। विधेयक पर अब राज्यपाल की स्वीकृति लेनी होगी। उसके बाद व्यवसायिक शिक्षा के लिए संचालित संस्थान मनमाना फीस नहीं ले सकेंगे। साथ ही उन्हें कई तरह की शर्तों का पालन करना होगा।
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कौन कौन होंगे व्यवसायिक शिक्षा के पाठ्यक्रम
शुल्क विनियमन समिति बैचलर ऑफ मेडिसिन व बैचलर ऑफ सर्जरी, डेंटल सर्जरी में स्नातक, आयुर्वेदिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में स्नातक, यूनानी चिकित्सा और शल्य चिकित्सा में स्नातक और प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग में स्नातक पाठ्यक्रम का फीस निर्धारित करेगी। इसके अलावा होम्योपैथिक चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा में स्नातक, अभियंत्रण में स्नातक, प्रौद्योगिकी में स्नातक, फार्मेसी में स्नातक, वास्तुकला में स्नातक पाठ्यक्रम का भी फीस निर्धारण होगा। होटल प्रबंधन और भोजन प्रबंधन प्रौद्योगिकी में स्नातक, नर्सिंग विज्ञान में स्नातक, कृषि विज्ञान में स्नातक, व्यवसाय प्रबंधन में स्नातक, विधायी कानून में स्नातक और विधि स्नातक, शिक्षा में स्नातक की भी फीस तय होगी। साथ ही मेडिकल स्ट्रीम में सभी मास्टर डिग्री पाठ्यक्रम, फार्मेसी में पीजी, अभियंत्रण में पीजी, प्रौद्योगिकी में पीजी, वास्तुकला में पीजी, नर्सिंग विज्ञान में पीजी, व्यवसाय प्रबंधन में पीजी, विधायी कानून में पीजी और विधि में पीजी, शिक्षा में पीजी, कृषि में मास्टर अॉफ साइंस, डिप्लोमा या स्नातक या स्नातकोत्तर या डॉक्टरेट या पोस्ट डॉक्टरेट स्तर के पाठ्यक्रम की फीस भी तय होगी।

इस तरह होगा शुल्क निर्धारण समिति का गठन
हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अनुशंसा पर रिटायर जज की अध्यक्षता में शुल्क निर्धारण समिति का गठन किया जाएगा। इस कमेटी में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के सचिव द्वारा नामित राज्य के किसी विश्वविद्यालय के कुलपति इसके उपाध्यक्ष होंगे। इनके अलावा एक चार्टर्ड अकाउंटेंट और अलग-अलग पाठ्यक्रमों से जुड़े लोग समिति में सदस्य बनाए जाएंगे। उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा विभाग के सचिव या स्वास्थ्य सचिव या कृषि सचिव समिति के पदेन सचिव होंगे। चार्टर्ड एकाउंटेंट की नियुक्ति अध्यक्ष की अनुशंसा पर की जाएगी। अध्यक्ष की नियुक्ति दो वर्षों के लिए होगी। उन्हें एक साल या 67 वर्ष की आयु तक कार्यकाल विस्तार दिया जा सकेगा। अध्यक्ष सरकार को सूचना देकर त्याग पत्र दे सकेंगे। अध्यक्ष का पद रिक्त होने पर सरकार तीन माह के भीतर नये अध्यक्ष की नियुक्ति करेगी। इस कमेटी में किसी भी निजी शिक्षण के संस्थान को सदस्य बनने की अनुमति नहीं होगी।

विधेयक की प्रमुख अन्य शर्तें
किसी भी उच्च शिक्षण संस्थान द्वारा कैपिटेशन शुल्क वसूलने या मुनाफाखोरी की किसी भी शिकायत की जांच शुल्क विनियमन समिति द्वारा की जाएगी। शुल्क विनियमन समिति उस संस्थान के प्रबंधन को साक्ष्य और स्पष्टीकरण के लिए अवसर देने के बाद ही दंडात्मक कार्रवाई करेगी।
अधिनियम के किसी भी नियम का उल्लंघन या किसी आदेश का अनुपालन नहीं होने के लिए दोषी पाए जाने पर समिति 20लाख रुपए तक का दंडात्मक जुर्माना अधिरोपित कर सकती है।
इसके अलावा नियमों के उल्लंघन पर दंडात्मक कार्रवाई के अलावा संबंधित विश्वविद्यालय को संबद्धता समाप्त करने की अनुशंसा कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर शुल्क निर्धारण कमेटी का गठन
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामिक एकेडमिक ऑफ एजुकेशन एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और पीए इनामदार एवं न्य बनाम महाराष्ट्र राज्य से जुड़े मामले में व्यावसायिक शिक्षा का शुल्क निर्धारण करने का आदेश दिया था। ताकि निजी संस्थानों द्वारा मनमानी फीस उगाही पर रोक लग सके। इस फैसले के बाद महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों ने शुल्क नियामक समिति का गठन कर दिया है। अब झारखंड ने भी इससे जुड़े विधेयक को सदन से पास करा लिया। इससे निजी संस्थानों की मनमानी फीस वसूली से त्रस्त अभिभावकों को राहत मिलेगी।
