जीतेंद्र कुमार
झारखंड में आज कल एक अजीब तरह की सेटिंग का खेल शुरू हो गया है। मुद्दा उठाओ, भड़काओ और फिर डील करके सेट हो जाओ। अब देखिए। एक महिला कैदी के प्रेग्नेंट होने का मुद्दा उठा। उसका ऑबर्शन हुआ या नहीं, मुद्दे का फिलहाल ऑबर्शन जरूर हो गया। सब कुछ सेट हो गया। थोड़ा माथे पर बल डालेंगे तो स्वास्थ्य विभाग पर एजी की रिपोर्ट पर झारखंड में बवाल खड़ा हो गया था। मुकदमा करने तक की धमकी दी गयी थी। आरोप-प्रत्यारोप का एक लंबा दौर चला। न मुकदमा हुआ और ना ही कोई जांच हुई, न अब कोई इसकी जांच कराने की मांग ही कर रहा है। रिम्स टू को लेकर भी कोई हल चलाने जाता था तो कोई वहां ग्रामीणों से मिल कर उनके आंदोलन को बल देने। लेकिन रिम्स टू को भी कैबिनेट से स्वीकृति मिल गयी। सब कुछ शांत हो गया। सेट हो गया। कुछ दिनों तक ट्रेजरी घोटाले की भी गूंज झारखंड में खूब सुनायी दी थी। वह भी शांत हो गयी। डीएमएफटी घोटाले पर सरकार को घेरने वाले चुप हो गए।

सत्ता के गलियारे की मानें तो अब एक तरह की नयी सेटिंग का दौर शुरू हो गया है। मामले को दफनाना है तो पहले मुद्दे उठवाओ। फिर सब कुछ सेट कराओ। कोई बाल बांका नहीं होगा। पहले का दौर दूसरा था। कार्रवाई करानी हो तो मुद्दे भड़काओ। उसे अंतिम मुकाम तक पहुंचाओ। अब देखिए ना। हाल में राज्यसभा चुनाव में क्रास वोटिंग का मुद्दा गरमाया गया था। कहीं कोई बोल रहा है। कांग्रेस ने माले और राजद पर क्रास वोटिंग का सीधा आरोप लगाया था। कुछ हुआ क्या। सब कुछ सेट हो गया। इसलिए होशियारी इसी में है कि सेटिंग सीखिए। सेटिंग के लिए सबको खुश रखिए और खुद भी खुश रहिए।
