द फॉलोअप डेस्क
धनबाद में वह हुआ जो आज तक नहीं हुआ था। पूर्व सांसद, राजनीतिक संत और महान विचारक रहे ए.के. राय के घर में शनिवार 16 अगस्त को तोड़फोड़ हुई। बता दें कि ए.के. राय इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन यह घटना शायद उनकी आत्मा को भी पीड़ा पहुंचा रही होगी। बता दें कि उनकी कुटिया अब माले कार्यालय बन गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि ए.के. राय के समर्थकों ने उनकी पार्टी का विलय कर लिया है। यही कारण है कि उनकी कुटिया में अब माले का कार्यालय खुल गया है। शनिवार 17 अगस्त की शाम माले के दो गुट आपस में भिड़ गए और यह क्षेत्र रणक्षेत्र में बदल गया।
क्या था विवाद का कारण?
इस विवाद का कारण था कोयला का DO यानी डिलीवरी ऑर्डर। ऐसे में माले के दो गुटों के लोगों के बीच जमकर मारपीट हुई और कार्यालय को भी निशाना बनाया गया। ऐसा लग रहा था कि मानो किसी के मन में ए.के. राय के लिए कोई सम्मान नहीं है। डिलीवरी ऑर्डर को लेकर विवाद इतना गहरा हो गया कि दो गुटों के बीच मामला गाली-गलौज तक पहुंच गया। ऐसे में कार्यालय की कुर्सियां और कई सामान भी तोड़ दिए गए। यह सिलसिला एक घंटे तक चलता रहा। दोनों पक्षों के लोग घायल भी हुए।
इसके बाद दोनों पक्षों ने बैंक मोड़ थाना में शिकायत भी दर्ज कराई। इसके बाद पुलिस ने घायलों को इलाज के लिए अस्पताल भेजा। कोयला को लेकर तो धनबाद हमेशा चर्चा में रहता है और आए दिन कोयलांचल में इसे लेकर झड़प होती रहती है। सवाल यह नहीं है कि कोयला को लेकर विवाद हुआ, सवाल यह है कि राजनीतिक संत और महान विचारक रहे ए.के. राय के कार्यालय में इस तरह की घटना उनके सम्मान को गिराने जैसा है।
ऐसे तो ए.के. राय किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं, लेकिन जानकारी के लिए बता दें कि ए.के. राय, बिनोद बिहारी महतो और दिशोम गुरु शिबू सोरेन ने मिलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा का गठन किया था। उस समय ये तीनों नेता काफी बड़े नेता माने जाते थे। इन तीनों की झारखंड में तूती बोलती थी और सभी लोग तीनों का काफी सम्मान भी करते थे। तीनों की कही बातें मानो लोगों के लिए पत्थर की लकीर बन जाती थीं।

वैचारिक मतभेद होने पर ए.के. राय धीरे-धीरे अलग हो गए और 'मार्क्सवादी समन्वय समिति' के नाम से अपनी पार्टी बनाई और उसे चलाने लगे। जो भी हो, ए.के. राय की राजनीतिक हनक कोयलांचल ने महसूस की थी। तीन बार सांसद और तीन बार विधायक रहे ए.के. राय ने अपना जीवन कोयला मजदूरों के नाम कर दिया था और अंतिम समय तक इसे निभाया भी। यह कहना ठीक नहीं होगा कि उनके परिवार वालों ने उन्हें अंतिम समय में छोड़ दिया था। लेकिन जब वे बीमार होकर सुदामडीह में एक कार्यकर्ता के घर रहने लगे तो उनके परिवार वालों ने उन्हें घर चलने का आग्रह किया, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया और धनबाद में ही अंतिम सांस ली। लेकिन उनकी विरासत को संभालने वाले, उनके संघर्ष को जानते-समझते हुए भी कार्यालय में हंगामा और तोड़फोड़ कर रहे हैं।
