द फॉलोअप डेस्क
रांची के मोहराबादी मैदान में आयोजित 'आदिवासी एकता महाजुट रैली' ने झारखंड के राजनीतिक समीकरणों में एक नई हलचल पैदा कर दी है। इस रैली के जरिए जहां एक ओर कांग्रेस ने अपने राजनीतिक वजूद और जनाधार का शक्ति प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर गठबंधन सरकार के भविष्य और पार्टी के अंदरूनी शक्ति-संतुलन को लेकर कई बड़े सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
बंधु तिर्की का 'शक्ति-प्रदर्शन' और प्रदेश अध्यक्ष की दावेदारी
डोमिसाइल आंदोलन से अपनी मजबूत पहचान बनाने वाले पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के लिए यह रैली केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि उनका व्यक्तिगत शक्ति-प्रदर्शन साबित हुई। संगठन क्षमता का लोहा मनवाने में वे सफल हुए। खेती और बरसात के व्यस्त मौसम के बावजूद लाखों की भीड़ जुटाकर बंधु तिर्की ने साबित कर दिया कि आदिवासी जनाधार पर उनकी पकड़ आज भी उतनी ही मजबूत है।

अदालती झटके के बाद भी सियासी हैसियत कायम
आय से अधिक संपत्ति मामले में सजायाफ्ता होने के बावजूद, अपनी पारंपरिक सीट से बेटी शिल्पी नेहा तिर्की को दो बार चुनाव जिताना और उन्हें मंत्री पद तक पहुंचाना, उनकी मजबूत राजनीतिक हैसियत को दर्शाता है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों और उनके करीबियों का मानना है कि इस रैली का मुख्य उद्देश्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष (प्रदेश अध्यक्ष) की कुर्सी के लिए उनकी स्वाभाविक दावेदारी को मजबूत करना है। लोकसभा और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को भी राज्य में एक ऐसे ही प्रभावी और करिश्माई आदिवासी चेहरे की तलाश है।
डीलिमिटेशन का मुद्दा और कांग्रेस की नई रणनीति
रैली का मुख्य उद्देश्य परिसीमन के उस फॉर्मूले का विरोध करना था, जिसमें केवल जनसंख्या के आधार पर सीटें तय की जाती हैं। रैली के मंच से मांग उठी कि आदिवासियों की आरक्षित सीटों की संख्या केवल जनसंख्या के आंकड़ों पर तय न हो, बल्कि सामान्य सीटों की तर्ज पर परिसीमन के बाद आदिवासी आरक्षित सीटों में भी इजाफा किया जाए।
'आंखों में आंखें डालकर' बात करने का बल
अब तक झारखंड मुक्ति मोर्चा के फैसलों पर सहमति जताने वाली कांग्रेस को इस विशाल भीड़ ने एक नई ताकत दी है। अब पार्टी गठबंधन में 'छोटे भाई' की भूमिका से बाहर निकलकर बराबरी का हक मांगने और अपने सुझावों पर अड़ने की स्थिति में आ गई है।
जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन पर पड़ता असर! दूरी या तालमेल?
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रैली की सफलता ने झारखंड गठबंधन सरकार के भीतर एक नया राजनीतिक खिंचाव पैदा कर दिया है। हेमंत सोरेन की अनुपस्थिति के मायने भी लगाये जा रहे हैं। निमंत्रण के बावजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का इस मंच पर न पहुंचना राज्य के राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसे गठबंधन में भविष्य की किसी अनबन या असहजता का संकेत माना जा रहा है। गठबंधन में तनाव की आशंका के रूप में भी देख जा रहा है। यदि कांग्रेस आगामी दिनों में अधिक सीटों या नीतिगत मामलों पर अड़ती है, तो जेएमएम और कांग्रेस के रिश्तों में खटास आ सकती है। राजनीति में अक्सर 'सहयोगी की बढ़ती ताकत' दूसरे दल के लिए असहजता का कारण बनती है।
विपक्ष का हमला और उठते सवाल
भाजपा ने इस रैली को लेकर कांग्रेस और बंधु तिर्की पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। चर्च और तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए भाजपा ने दावा किया यह आदिवासियों का वास्तविक जुटान नहीं था, बल्कि इसके पीछे चर्च की मदद और जुर्माना लगाने का डर दिखाकर जुटाई गई भीड़ थी। रैली के मंच पर भगवान बिरसा मुंडा और कार्तिक उरांव जैसे महान आदिवासी नायकों की तस्वीरें न होने पर भी विपक्ष ने तीखा हमला बोला है। विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस की गलत नीतियों और तुष्टिकरण के कारण झारखंड में आदिवासियों की जनसांख्यिकी प्रभावित हो रही है।

भविष्य के सवाल
'आदिवासी एकता महाजुट रैली' में जुटी भीड़ ने यह सिद्ध कर दिया कि बंधु तिर्की के पास जनाधार और भीड़ जुटाने की क्षमता दोनों हैं। हालांकि, सवाल यह भी उठता है कि क्या कांग्रेस के आधिकारिक बैनर तले यह भीड़ नहीं जुट पाती? शायद इसी संशय के कारण कांग्रेस ने औपचारिक रूप से इसका आयोजन अपने नाम से नहीं किया। दक्षिण भारत का मुद्दा हो या किसी अन्य राज्य का, कांग्रेस जनसंख्या के आधार पर परिसीमन में सीटों के निर्धारण पर आपत्ति जताती रही है। स्वयं राहुल गांधी ने भी दक्षिणी राज्यों में इस मुद्दे पर रैलियों को संबोधित किया है। ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस ने इस रैली का आयोजन सीधे अपने बैनर तले क्यों नहीं किया? दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि आदिवासियों के नाम पर बुलाई गई इस रैली में मुख्य रूप से ईसाई समुदाय के लोगों को जुटाया गया था। आरोप यह भी है कि भीड़ जुटाने में चर्च ने सहयोग किया और जुर्माने का डर दिखाकर लोगों को गांवों से निकालकर मोहराबादी मैदान तक पहुंचाया गया। विपक्ष का तर्क है कि कांग्रेस की गलत नीतियों और तुष्टिकरण की राजनीति के कारण ही झारखंड में आदिवासियों की जनसंख्या लगातार घट रही है। इसके अतिरिक्त, 50 प्रतिशत सीटें सीधे बढ़ाने के मुद्दे पर कांग्रेस ने सदन में सरकार का साथ नहीं दिया था और अब वह जनता को भ्रमित करने का प्रयास कर रही है। मंच पर भगवान बिरसा मुंडा और कार्तिक उरांव जैसे महान समाज सुधारकों की तस्वीरें न होने पर भी विपक्ष सवाल उठा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आमंत्रण के बावजूद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मंच पर न पहुंचना केवल एक सामान्य बात नहीं है। यह गठबंधन में एक ऐसे दौर की शुरुआत का संकेत हो सकता है, जहां सहयोगी दल एक-दूसरे की सफलता से सहज महसूस नहीं करते। आगामी दिनों में यदि कांग्रेस बराबरी के अधिकार के साथ आंखें मिलाकर बात करेगी, तो यह बढ़ता राजनीतिक बल उसे झामुमो से दूर भी कर सकता है।
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