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सत्ता और सचिवालय का सच : रास्ते की तलाश में अवैध व्यापारी और राजनीति के कारोबारी

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जीतेंद्र कुमार
अक्सर चुनाव के समय किसी राज्य की सीमाएं सील की जाती है। अवैध तस्करी को लेकर भी कभी कभी कोई राज्य अपनी सीमा पर पहरा बढ़ा देता है। लेकिन अलग अलग राज्यों की जनता ने अप्रत्याशित रूप से झारखंड की सीमा के परे पहरा लगा दिया है। अभी आप पूरी बात शायद नहीं समझे होंगे। क्योंकि आप प्रभावित नहीं हो रहे हैं। जो प्रभावित होने लगे हैं वे, बेहतर समझने लगे हैं। वे परेशान और हलकान भी हो उठे हैं। इनमें कोयला कारोबारी शामिल हैं तो बालू कारोबारी भी। सरकारी कारोबारी हैं तो राजनीतिक व्यापारी। उन्हें समझ में नहीं आ रहा कि झारखंड से लूट कर अब वे किस रास्ते कहां जाएं। जी हम बात कर रहे हैं झारखंड की। इसकी चारो तरफ की सीमाएं सील हो गयी है।


झारखंड की सीमाएं पश्चिम बंगाल से लगती है तो बिहार से भी। उधर उड़ीसा से सटती है तो कुछ यूपी से भी लटकती है। छत्तीसगढ़ से तो सटती ही है। अब झारखंड में इंडिया गठबंधन की सरकार है तो इन राज्यों में एनडीए की सरकार। अब झारखंड से भाग कर निवेश के सारे रास्तों पर पहरा बैठ गया है। कैसे जाएंगे, यह सवाल परेशान करने लगा है। पहले तो आप साड़ी खरीदने कोलकाता भी चले जाते थे। अब अगर सीधे उड़ कर दिल्ली जाते हैं तो वहां भी परेशानी है। मुंबई की उड़ान भरते हैं तो भी आफत कम नहीं है। इस तरह अजीब चक्रब्यूह में फंस गए हैं झारखंड के तरह तरह के अवैध व्यापारी और राजनीति के कारोबारी। बताते हैं कि इस मुसीबत से निकलने को राजनीतिक रास्ता भी तलाशने में लग गए हैं तरह तरह के कारोबारी।

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