जीतेंद्र कुमार
यह सचिवालय का कड़वा सच है। यहां जिसे पढ़ाना नहीं आता वही कॉपी जांचता है। अलग राज्य बनने के बाद से ही यह खेल जारी है। सरकार किसी की भी हो इस परंपरा में कोई परिवर्तन नहीं हो रहा है। कहानी डीपीआर बनाने की है। झारखंड सरकार के पास अभियंताओं की बड़ी-बड़ी फौज है। लेकिन ये पढ़े-लिखे अभियंता निर्माण कार्य से जुड़े कार्यों के लिए डीपीआर बनाने में सक्षम नहीं है। उन्हें डीपीआर बनाना नहीं आता है। डीपीआर बनाने का काम निजी एजेंसियो को दी जाती है। डीपीआर बनता है, फिर उस डीपीआर के अनुसार भले ही काम हो या ना हो एजेंसियों को भारी भरकम राशि का भुगतान जरूर होता है। पथ निर्माण विभाग हो या भवन निर्माण विभाग, जल संसाधन विभाग हो या ऊर्जा विभाग, यह सड़क, भवन या निर्माण से जुड़े कोई भी कार्य का डीपीआर निजी एजेंसियां ही बनवाता है। अगर इन विभागों के अलमारियों को खंगाला जाए तो ऐसे हजारों डीपीआर पड़े मिलेंगे जिसको बनवाने पर सरकार ने अरबों रुपए खर्चे तो किये लेकिन उस पर काम नहीं हुआ।.jpeg)
दिलचस्प यह भी है कि इन निर्माण से जुड़े विभागों में डिजाइन बनाने के लिए अलग-अलग विंग भी है। निरुपन संगठन व अन्य। लेकिन इन संगठनों को कोई भी सरकार कभी मजबूत करने की कोशिश नहीं की। इसे सक्षम बनाने का प्रयास ही नहीं किया गया, ताकि निजी एजेंसियों से डिजाइन बनवाने पर खर्च होने वाली अरबों रुपए की राशि को बचाया जा सके। उदाहरण के लिए झारखंड सरकार ने हाईकोर्ट, विधानसभा, सचिवालय बनाने की जिम्मेवारी पूर्व में जीआरडीए को सौंपी थी। कोलकाता की सीईसी कंपनी ने डीपीआर बनाया। विधानसभा और हाईकोर्ट बन गया। सरकार बदलने पर सचिवालय निर्माण का कार्य रोक दिया गया। फिर सचिवालय निर्माण की जिम्मेदारी जुडको को दी गई। जुडको पर हर सरकार की विशेष मेहरबानी रही है। अब बताया जा रहा है कि सचिवालय निर्माण का काम फिर उसी पुरानी जगह पर होगी जहां विधानसभा का निर्माण हुआ है। अब सरकार के भीतर के इस बड़े खेल का असली चेहरा यह है की डीपीआर का निर्माण करने में अक्षम सरकार के अभियंता ही निजी एजेंसियों द्वारा बनाए जाने वाले डीपीआर को टेक्निकल अप्रूवल देते हैं।
बात वहां पलट कर आती है कि जिन अभियंताओं को डीपीआर बनाना नहीं आता वह भला दूसरे के बने डीपीआर की खामियों को कैसे समझ पाते हैं। इस खेल के जानकार बताते हैं, कि निर्माण कार्य से जुड़े विभाग अब तो करोड़-दो-करोड़ रुपए की योजनाओं का डीपीआर भी निजी एजेंसियों से ही बनवाने लगे हैं। जबकि पूर्व में हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के लिए बनने वाले बंगलो का डीपीआर सरकार के ही अभियंताओं ने बनाया था। अब निजी एजेंसियों से डीपीआर बनवाने के खेल के पीछे के कारणों को सरकार में बैठे लोग और अभियंता ठेकेदार तो जानते ही हैं, शायद आप भी समझ गए होंगे कि इसके पीछे का काला सच क्या हो सकता है। जानकारों का दावा है कि अगर राज्य बनने के बाद जितने भी डीपीआर बने, उसकी जांच हो जाए तो झारखंड में एक और बड़ा घोटाला सामने आ सकता है। लेकिन वह यह भी बताते हैं कि ऐसा कदापि संभव नहीं होगा। क्योंकि इस खेल में राज्य की सभी सरकारे समान रूप से शामिल रही है। हमाम में सभी नंगे बताए जाते हैं। और जब ऐसा होगा तो जांच कौन कराएगा। लेकिन डिजाइन विंग को ही केवल मजबूत कर दिया जाए तो झारखंड को प्रतिवर्ष और अरबों रुपए की बचत होने लग सकती है।