द फॉलोअप डेस्क
सारंडा सघन वन क्षेत्र को सेंचुरी घोषित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सरकार विधि विशेषज्ञों की राय ले रही है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने दिल्ली दौरे में इस मुद्दे पर विधि विशेषज्ञों से राय ली है। वहां उन्होंने मुख्य सचिव अलका तिवारी और अपर मुख्य सचिव अविनाश कुमार के साथ विधि विशेषज्ञों के साथ बैठक भी की। मालूम हो कि सारंडा वन क्षेत्र को आठ अक्टूबर तक सेंचुरी घोषित नहीं करने पर सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य सचिव को जेल भेजने की चेतावनी दी है। इधर जमशेदपुर पश्चिमी के विधायक सरयू राय ने 24 जून को वन एवं पर्यावरण विभाग के सचिव द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष शपथ पत्र पर स्वीकृति देने के बावजूद झारखंड सरकार द्वारा 858.18 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाले सारंडा सघन वन के 575.19 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य और 136.03 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कंजर्वेशन रिजर्व घोषित करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को क्रियान्वित नहीं करना दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।

लौह-अयस्क खनन को प्राथमिकता देने का आरोप
सरयू राय ने कहा है कि सारंडा के सतह पर स्थित प्राकृतिक संसाधनों, वन्य जीवों एवं जैव विविधता का संरक्षण करने को प्राथमिकता देने के बदले झारखंड सरकार सतह के नीचे स्थित लौह-अयस्क का खनन करने को प्राथमिकता देना चाह रही है। जबकि सर्वोच्च न्यायालय का स्पष्ट निर्देश है कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और खनन, उद्योग आदि योजनाओं के बीच हितों का टकराव होने की स्थिति में पर्यावरण एवं प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण को प्राथमिकता मिलेगी. उन्होंने आश्चर्य जताया कि सरकार को विधि-परामर्श देने वालों तथा खान, उद्योग और वन एवं पर्यावरण विभाग के सक्षम अधिकारी इस बारे में सरकार को सही सलाह क्यों नही दे रहे हैं। सरयू राय का कहा है कि वह वर्ष 2003-04 से सारंडा क्षेत्र में खान एवं वन विभाग के अधिकारियों द्वारा अविवेकपूर्ण खनन को बढ़ावा देने के प्रति सरकार को प्रमाण सहित सचेत करते आ रहे हैं। लौह-अयस्क के अवैध खनन की जांच के लिए 2010 में गठित जस्टिस एमबी शाह आयोग ने इस बारे में सरकार को ठोस सुझाव दिया है। 2011 में गठित समन्वित वन्यजीव प्रबंधन योजना समिति ने भी अपने प्रतिवेदन में सरकार को अविवेकपूर्ण खनन के प्रति सचेत किया था।