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बिहार चुनाव : जंगल राज के दाग को नहीं धो सके तेजस्वी, नीतीश की सुशासन बाबू की छवि पर जनता ने विश्वास किया

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जीतेंद्र कुमार

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणाम ने सबको चौंका दिया है। जीत का जश्न मना रहे दलों को भी यह अनुमान नहीं था। बीजेपी ने जीत के अपने पिछले सारे रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया। स्ट्राइक रेट के रूप में। वहीं राजद की बहुत बुरी स्थिति हुई। राजद के सहयोगी कांग्रेस बिहार से इस बार लुप्त प्राय हो गयी है। बिहार की जनता ने इस बार ऐसा चुनाव परिणाम दिया है जिसके बाद विपक्ष चुनाव आयोग और ईवीएम पर भी सवाल खड़ा करने लगा है। लेकिन चुनाव परिणाम पर आरोप-प्रत्यारोपों के बीच यह तो स्पष्ट है कि बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के सुशासन बाबू की छवि पर विश्वास किया। भाजपा अपने पूरे चुनाव अभियान में राजद सरकार के जंगल राज की याद दिला कर इस जुमले को भुनाने में सफल हुई है। लेकिन एनडीए की इस जीत में प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी और एआईएमआईएम की प्रभावी भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के वोट चोर, गद्दी छोड़ का नारा, नारा ही बन कर रह गया। वह जनता के दिल में नहीं उतर सकी। लालू प्रसाद की अनुपस्थिति, तेज प्रताप का विद्रोह और तेजस्वी को लेकर परिवार के भीतर असंतोष ने भी एनडीए को बढ़त दिलाने में कहीं न कहीं उत्प्रेरक का काम किया लगता है।

राजद के जंगल राज को भुनाने में सफल रही भाजपा

भाजपा ने पूरे चुनाव अभियान में लालू प्रसाद यादव के कार्यकाल को जंगल राज के रूप में प्रस्तुत किया। भाजपा और जदयू के नेता हर चुनावी मंच से जंगल राज का भय दिखा कर जनता को अपने पाले में लाने की पुरजोर कोशिश की। एनडीए के इस रणनीति का कहीं न कहीं जनता पर गहरा असर पड़ा। मतदाता भयभीत हुए। उन्हें कहीं न कहीं लगने लगा कि राजद की सरकार बनी तो फिर बिहार में जंगल राज कायम हो सकता है।

प्रशांत किशोर का हथियार डालना

पिछले दो साल से प्रशांत किशोर बिहार में जीतोड़ मेहनत कर रहे थे। पैसा खर्च कर रहे थे। गांव गांव का दौरा किया। अभियान चलाया। लगभग प्रत्येक गांव में जन सुराज पार्टी के 5-10 कार्यकर्ता खड़े किए। लेकिन चुनाव के ऐन वक्त पर टिकट बांटने के साथ ही उन्होंने हथियार डाल दिए। जिस तरह उन्होंने टिकट बांटा और भाजपा, जदयू और राजद पर अटैकिंग अभियान को त्याग दिया, उसके बाद से बिहार में उनके समर्थक उन्हें गाली देने पर उतारू हो गए थे। टिकट बंटवारे का एक उदाहरण हाजीपुर का दिया जा सकता है। जन सुराज पार्टी से चुनाव लड़ने के लिए हाजीपुर स्थिति सोनी अलंकार स्वर्णाभूषण दुकान के मालिक कृष्ण भगवान पिछले दो साल से मेहनत कर रहे थे। भगवान गांव गांव का दौरा कर रहे थे। आम लोगों की मदद में पैसा बहा रहे थे। लेकिन जब टिकट बंटवारे का मौका आया तो उन्होंने दिल्ली बेस्ड महिला प्रतिभा सिन्हा को टिकट दे दिया। उस महिला को जिन्हें विधानसभा क्षेत्र के बारे में भी पता नहीं था।

एआईएमआईएम ने भी महागठबंधन को परेशान किया

एआईएमआईएम के बारे में कहा जा रहा था कि उसका सीमांचल के क्षेत्र में मजबूत पैठ है। लेकिन एआईएमआईएम का सीमांचल के बाहर दूसरे विधानसभा क्षेत्रों में भी असर रहा। इसका उदाहरण महुआ की चर्चित सीट प्रमाण देती है। महुआ में एआईएमआईएम के अमित कुमार ने अच्छा वोट लाया। यह वोट कहीं न कहीं राजद का वोट था। अल्पसंख्यकों का वोट किसी भी स्थिति में इस बार एनडीए प्रत्याशियों को नहीं मिलना था। नहीं मिला। इस कारण महुआ में राजद के साथ साथ तेज प्रताप को धक्का लगा। मुसलिम समुदाय इस बार राजद या कांग्रेस के साथ उस तरह एकजुट नहीं हुए, जैसा उनके बारे में कहा जाता रहा है।

फ्री बी का जलवा रहा

चुनाव से पहले बिहार की जदयू सरकार ने कई घोषणाएं की। बिहार में मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना की राशि को 400 रुपए से बढ़ा कर 11 रुपए प्रति माह किया गया। 125 यूनिट तक बिजली फ्री की गयी। झारखंड से उलट वहां 125 यूनिट बिजली फ्री की तकनीक भी अलग रखी गयी। बिहार में अगर कोई उपभोक्ता 150 यूनिट बिजली का उपयोभोग करता है तो उसे मात्र 25 यूनिट बिजली का ही भुगतान करना पड़ता है। इसके अलावा चुनाव से ठीक पूर्व महिलाओं के खाते में भेजी गयी 10 हजार रुपए की राशि भी काम आयी। शायद यही कारण भी रहा कि महिलाएं पुरुषों की तुलना में बढ़ चढ़ कर मतदान किया। पहली बार जिन राज्यों में फ्री बी की शुरुआत हुई, वहां उसकी सरकार बनी। मध्य प्रदेश, दिल्ली, झारखंड, महाराष्ट्र व अन्य राज्य इसके उदाहरण हैं।

महागठबंधन की प्रत्येक परिवार को नौकरी की घोषणा पर विश्वास पैदा नहीं हुआ

राजद ने युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए प्रत्येक परिवार को एक सरकारी नौकरी देने का वादा किया था। लेकिन इस पर वहां के जागरुक युवा विश्वास नहीं कर सके। हालांकि चुनाव के क्रम में ही युवा इस घोषणा पर अपनी प्रतिक्रिया देने लगे थे। कहने लगे थे कि यह डपोरशंखी घोषणा है। यह सच भी है। केंद्र की एनडीए सरकार ने भी प्रति वर्ष एक करोड़ नौकरी देने का वादा किया था। देश की कई अन्य राज्य सरकारों ने भी इस तरह की नौकरी देने की घोषणा की, लेकिन कभी वह पूरा नहीं हुआ।

जातीय राजनीति में दरार और एकजुटता भी दिखी

बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम ने वहां की घोर जातिवादी राजनीति पर भी चोट किया है। ऐसा माना जाता रहा था कि बिहार में यादव और मुसलिम राजद के साथ पूरी तरह इंटैक्ट हैं। इन दोनों ही जातियों की जनसंख्या लगभग 30 फीसदी है। अगर इसमें दूसरी जातियों के कुछ न कुछ वोट जुड़ते हैं तो राजद या महागठबंधन को हराना मुश्किल है। लेकिन चुनाव परिणाम ने ऐसा कोई संदेश नहीं दिया। यह भी संदेश दिया है कि राजद की विरोधी रही जातियां अब भी उसके विरोध में ही खड़ी है। अति पिछड़े नीतीश कुमार के ही बन कर रहे। अगड़ी जातियों का झुकाव एनडीए की ओर ही रहा। लालगंज विधानसभा सीट इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिखता है, जहां बाहुबली मुन्ना शुक्ला की पुत्री शिवानी शुक्ला को उनके स्वजातीय मतदाताओं का मत नहीं मिला। मोकामा में भी स्वजातीय मतदाता राजद की टिकट पर चुनाव लड़ रहे सूरजभान की पत्नी वीणा सिंह के साथ नहीं गयी। जातीय राजनीति करनेवाले दलों से बिहार की जनता अब जुड़ने की जगह उसके विरोध में जाना पसंद की है।

चुनाव परिणाम के बाद अब कुछ प्रमुख सवाल

प्रशांत किशोर ने कहा था कि अगर जदयू 25 से अधिक सीटें ले आया तो वह राजनीति छोड़ देंगे। क्या अब वह ऐसा ही करेंगे। जदयू से कहीं अधिक सीटें मिलने के बाद क्या भाजपा अपना मुख्यमंत्री बनाने का प्रयास करेगी। चिराग पासवान की पार्टी की अप्रत्याशित सफलता के बाद वह उप मुख्यमंत्री बनाने की मांग करने की स्थिति में रहेंगे। क्योंकि भाजपा और जदयू को अब किसी तीसरे दल की सरकार बनाने के लिए जरुरत ही नहीं दिखती। जदयू, राजद और कांग्रेस की सीटों को जोड़ने पर भी अंतिम परिणाम आने तक 122 का आंकड़ा प्राप्त होता नहीं दिख रहा है, इस स्थिति में नीतीश कुमार राजद के साथ जाने की स्थिति में होंगे। इस तरह के सवाल किए जाने लगे हैं। डबल इंजन की सरकार बनने से बिहार में विकास को गति मिलने का भी दावा किया जाने लगा है।

1990 से बिहार विधानसभा चुनाव के अब तक के परिणाम

1990-जनता दल(राजद और जदयू)-122, कांग्रेस 71, भाजपा-39, सीपीआई-23

1995-जनता दल (राजद और जदयू)-167, कांग्रेस-29, भाजपा-41, सीपीआई-26

2000-राजद-124, भाजपा-67, समता पार्टी-34, कांग्रेस-23, जदयू-21

2005-जदयू-88, भाजपा-55, राजद-54, कांग्रेस-09

2010-जदयू-115, भाजपा-91, राजद-22, कांग्रेस-04

2015-भाजपा-53, जदयू-71, राजद-80, कांग्रेस-27

2020-भाजपा-74, जदयू-43, राजद-75, कांग्रेस-19

 

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