द फॉलोअप डेस्क
कड़ाके की ठंड खुले आसमान के नीचे ठिठुरती ज़िंदगी और मजबूरी में फैला हाथ, यह तस्वीर इन दिनों झारखंड के हजारीबाग जिले के नए बस स्टैंड के समीप सरना मैदान में देखने को मिल रही है, जहां उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले से आए कई परिवार भीख मांगकर जीवन यापन करने को मजबूर हैं। दिसंबर के बीतते दिनों में झारखंड में ठंड अपने चरम पर है। ठंड से बचने के लिए ये लोग पिछले दो दिनों से कंबल की तलाश में दर-दर भटकते रहे। कई लोग शारीरिक रूप से असहाय हैं, तो कई वृद्ध और महिलाएं छोटे बच्चों के साथ खुले में रात गुजारने को मजबूर हैं।
द फॉलोअप से बातचीत के दौरान कंबल लेने की कतार में खड़े एक व्यक्ति भावुक हो उठे। उन्होंने कहा, "हमारा सोनभद्र पहाड़ों और प्राकृतिक संपदाओं से घिरा है। फैक्ट्रियां हैं, एनटीपीसी जैसी बड़ी कंपनियां हैं, लेकिन हमारे दर्द को सुनने वाला कोई नहीं। पहाड़ों पर खेती नहीं हो पाती, रोजगार नहीं मिलता, इसलिए हम दूसरे राज्यों में आकर भीख मांगने को मजबूर हैं।" उनकी आंखों में सवाल था. सरकार वादे तो बहुत करती है, लेकिन योजनाएं ज़मीन पर क्यों नहीं उतरतीं? देश के सबसे बड़े प्रदेश का संसाधन-समृद्ध जिला भी अगर पलायन को मजबूर है, तो कसूर किसका है? एक अन्य बुज़ुर्ग ने कड़वी सच्चाई बयां करते हुए कहा “झूठ नहीं बोलेंगे साहब, वृद्धा पेंशन आती है। लेकिन उस पैसे से घर, बच्चे, दवा, खाना सब कैसे चलेगा? इसलिए भीख मांगकर ही गुजर-बसर करना पड़ता है।"
एक महिला ने भारी मन से कहा, "सरकार पांच किलो अनाज देती है, लेकिन बच्चों को क्या खिलाएं? खुद क्या खाएं? मजबूरी में यहां आना पड़ा। ये कोई शौक नहीं है साहब, ये हमारी मजबूरी है।" इन तमाम पीड़ाओं के बीच राहत की एक किरण भी नजर आई। मददगार फाउंडेशन ने आगे बढ़कर इन जरूरतमंदों को कंबल वितरित किए। कंबल पाकर लोगों की आंखों में आंसू और चेहरे पर थोड़ी सी राहत दिखाई दी।
एक व्यक्ति ने झारखंड के लोगों की दरियादिली की तारीफ करते हुए कहा, "हम इतने दूर से आए हैं, लेकिन यहां के लोग, प्रशासन या सरकार किसी ने हमें परेशान नहीं किया। झुग्गी बनाकर रह रहे हैं, थोड़ा-बहुत कमा खा रहे हैं, कोई रोक-टोक नहीं। ये यहां के लोगों की इंसानियत और बड़प्पन है।" यह कहानी सिर्फ ठंड और कंबल की नहीं है, बल्कि उस सिस्टम पर सवाल है जो प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर इलाकों के लोगों को भी पलायन और भीख मांगने पर मजबूर कर देता है,जब तक योजनाएं कागजों से निकलकर ज़मीन पर नहीं उतरेंगी, तब तक सरना मैदान जैसी तस्वीरें हमारे ज़मीर को यूं ही झकझोरती रहेंगी।
