जीतेंद्र कुमार
एक दिन एक व्यक्ति फॉलोअप आया। वह झारखंड का भविष्य बताने लगा। नियम-कानून समझाने लगा। उपलब्धियां गिनाने लगा। रांची में बनने वाले फ्लाई ओवर के बारे में भी खुलासा करने लगा। बताते-बताते, बताता चला गया। हरमू का काम अमुक कंपनी को मिलेगा। करमटोली का दूसरी कंपनी का। अरगोड़ा का काम तीसरी कंपनी को। आप भविष्य वक्ता हैं क्या ? सवाल करने पर वह हत्थे से उखड़ गया। दो-दो हाथ करने को उतारू हो उठा। बहस में बातें तीखी भी हुई। एक्शन पर कुछ रिएक्शन भी हुए। लेकिन उस व्यक्ति के दावे में दम दिख रहा था। विश्वास करने के कई तर्क थे। फॉलोअप ने उस व्यक्ति के बयान पर विश्वास कर खबर चला दिया। अब खबर सच साबित हुई है। उन्हीं कंपनियों को काम मिलने जा रहा है। वही कंपनियां एल-1 हुई है। अब रेट निगोशिएट होने वाला है। वह भी होगा। सब कुछ होगा। क्योंकि सब कुछ पहले से तय है।

नयी कहानी अब कुछ और है। काम ही नहीं, सबको चाहिए मनमाफिक दाम भी। सेटिंग कहें या संयोग, जारी है। दर के शेड्यूल रेट से ऊपर जाने की तैयारी है। इस पर विभिन्न कंपनियों की नजर गड़ी है। उधेर-बुन जारी है। मामले को हाईकोर्ट ले जाने की भी तैयारी है। इसके लिए शेड्यूल रेट के विश्लेषण पर मारामारी है। लेकिन अगले की भी दो-दो हाथ करने की तैयारी है। यह भी सच है कि अंततः विरोधियों के ही हारने की बारी है। क्योंकि सब कुछ पर सेटिंग भारी है। सेटिंग में शामिलों में, सबका मिलेगा साथ, सबका हो विकास, इसको लेकर आपस में नहीं कोई मारामारी है।
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