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झारखंड स्टार्टअप पॉलिसी की धीमी रफ्तार पर उठे सवाल: क्या युवाओं से किया गया वादा सिर्फ काग़ज़ों तक सीमित था?

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रांची
झारखंड में स्टार्टअप इकोसिस्टम को सशक्त बनाने के लिए वर्ष 2016 में घोषित की गई "झारखंड स्टार्टअप पॉलिसी" को लेकर अब गम्भीर सवाल खड़े हो रहे हैं। इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन ने मुख्य सचिव को एक पत्र भेजकर आरोप लगाया है कि इस नीति के तहत किए गए अधिकांश वादे आज तक ज़मीन पर नहीं उतर पाए हैं।
एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रथिन भद्रा द्वारा भेजे गए पत्र में दावा किया गया है कि 2016 की नीति में चयनित स्टार्टअप्स को प्रोटोटाइप डेवलपमेंट, मार्केटिंग स्टाइपेंड और अन्य वित्तीय व तकनीकी सहायता का आश्वासन दिया गया था। लेकिन पिछले 6 वर्षों में न तो कोई आर्थिक सहयोग मिला, न ही कोई इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किया गया।
पत्र में यह भी कहा गया है कि इसी अवधि में राज्य सरकार द्वारा एक विशेष गांव में केवल 10 दिनों में सड़क, बिजली और वाई-फाई जैसी सुविधाएं उपलब्ध करा दी गईं। यह उदाहरण दर्शाता है कि जब सरकार चाहती है, तो वह असंभव कार्य भी संभव बना सकती है। ऐसे में सवाल उठता है कि स्टार्टअप्स को प्राथमिकता क्यों नहीं दी गई।


रथिन भद्रा ने यह भी कहा कि: 
•    पिछले 5 वर्षों से सरकार को बार-बार पत्र और निवेदन दिए गए, लेकिन ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
•    संसाधनों की कोई कमी नहीं है, फिर भी 80% स्टार्टअप्स या तो राज्य से बाहर चले गए हैं या बंद होने की स्थिति में हैं।
पत्र में मुख्य सचिव से स्पष्ट जवाब मांगे गए हैं कि क्या 2016 की नीति सिर्फ एक “कागज़ी घोषणा” थी? और क्या राज्य की युवा उद्यमी शक्ति को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा?
इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन ने अपनी चार प्रमुख मांगें रखी हैं:
1.    चयनित स्टार्टअप्स को अविलंब वित्तीय सहायता दी जाए।
2.    राज्य में समर्पित इनक्यूबेशन सेंटर स्थापित किए जाएँ।
3.    2016 की नीति को बिना देरी के लागू किया जाए।
4.    अधिकतम तीन माह के भीतर एक टाइमबाउंड एक्शन प्लान घोषित किया जाए।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह प्रश्न उठाया है कि क्या झारखंड में युवा नवप्रवर्तकों को उनके विचारों को साकार करने के लिए सही मंच और समर्थन मिल पा रहा है, या फिर वे सिर्फ वादों के सहारे ही भविष्य की उम्मीदें संजो रहे हैं। सरकार की ओर से इस पर प्रतिक्रिया आनी अभी बाकी है।

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