जीतेंद्र कुमार
झारखंड हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के हाल के दो आदेशों ने सचिवालय के सच को फिर से उजागर किया है। नगर निकाय चुनाव से संबंधित अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को जेल भेजने की चेतावनी दी है। 14 अक्तूबर को आरोप तय करने की बात कही है। उधर सारंडा वन क्षेत्र को आठ अक्तूबर तक सेंचुरी घोषित नहीं करने पर मुख्य सचिव को ही जेल भेजने की चेतावनी दी है। हालांकि इससे पहले भी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट राज्य सरकार के अन्य अधिकारियों को अवमानना याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए जेल भेजने की चेतावनी देता रहा है। लेकिन हाल के वर्षों में राज्य सरकार का कोई भी वरीय अधिकारी जेल नहीं भेजा गया। यही कारण रहा कि न्यायालयों की इस तरह के आदेशों को हमारे अधिकारी हल्के में लेते रहे। न्यायालयों के आदेशों के अनुपालन में लापरवाही बरतते रहे। परिणाम स्वरूप न्यायालय को आज राज्य सरकार के वरिष्ठतम नौकरशाह मुख्य सचिव को जेल भेजने की धमकी देनी पड़ रही है। क्योंकि नौकरशाहों में सबसे महती जिम्मेदारी इन्हीं की बनती है।
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अब सवाल उठता है कि केवल मुख्य सचिव ही जेल जाएंगे। पर सच यही है कि न मुख्य सचिव जेल जाएंगे और ना जाना चाहिए। लेकिन कार्यपालिका के सर्वोच्च मंदिर सचिवालय के सिस्टम पर सवाल तो खड़ा हो ही गया है। कोर्ट के आदेश का समय पर पालन क्यों नहीं हो रहा। इसके लिए जिम्मेदार कौन। अगर जिम्मेदार को चिह्नित कर नीचले स्तर पर ही उसके विरुद्ध कार्रवाई करने की सरकार में कूबत होती तो आज यह स्थिति ही पैदा नहीं होती। लेकिन सरकार के शीर्ष पर बैठे अधिकारी जब आदेशपाल की भूमिका निभाने लगते हैं तो इसी तरह की स्थिति बनती है। कायदे और कानून पर विचार और विचारधारा प्रभावी हो जाती है। और सिस्टम में मध्यम व निम्न क्रम के लोग केवल तांक-झांक और गुफ्तगू करते हैं। इसलिए समय आ गया है कि सिस्टम को दुरुस्त किया जाए। क्योंकि सिस्टम जब ठीक रहेगा तभी सरकार और सत्ता सभी दुरुस्त रहेगी। इसलिए सिस्टम को मजबूत करने की चिंता जरूर दिखने लगी है। और यह जिम्मेवारी राज्य सरकार के हर उस बड़े अधिकारी और मंत्री के सामने आ खड़ी हुई है, जो सचिवालय में बैठते हैं। यहां से राज्य के सबसे नीचले स्तर के प्रशानिक ईकाई को दुरुस्त, पारदर्शी और प्रभावी बनाने की बात करते रहते हैं।
