रांची
आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद ने झारखंड सरकार पर नगड़ी मौजा की भूमि पर जबरन और गैरकानूनी कब्जा जमाने का गंभीर आरोप लगाया है। परिषद की ओर से जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि रांची के कांके अंचल स्थित नगड़ी मौजा की 227.71 एकड़ कृषि भूमि को वर्ष 1960 के दशक में तत्कालीन बिहार सरकार ने बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के विस्तारीकरण हेतु अधिग्रहित किया था, लेकिन बीते 60 वर्षों में उस जमीन का कोई उपयोग नहीं किया गया।
परिषद के अनुसार, जमीन अब भी मूल भू-स्वामियों के कब्जे में है और वे नियमित रूप से सरकार को जमाबंदी देते रहे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि भूमि अधिग्रहण की तत्कालिकता (अर्जेंसी) केवल कागजी थी और भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा-17(1) और 17(4) का दुरुपयोग किया गया।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला
प्रेस विज्ञप्ति में परिषद ने सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले (SLP C.No. 8939/2010, देव शरण बनाम उत्तर प्रदेश राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि यदि सरकार अधिगृहित भूमि पर लंबे समय तक कब्जा नहीं कर पाती है, तो यह साबित करता है कि अर्जेंसी नहीं थी। नगड़ी भूमि का मामला भी इसी श्रेणी में आता है।
CNT एक्ट का उल्लंघन
आदिवासी क्षेत्र सुरक्षा परिषद ने यह भी कहा कि झारखंड के छोटानागपुर क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण केवल छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 (CNT एक्ट) की धारा-50 के तहत ही किया जा सकता है। अधिग्रहण अधिनियम 1894 का प्रयोग केवल मुआवजे के निर्धारण के लिए किया जाना चाहिए। परिषद ने आरोप लगाया कि नगड़ी भूमि का अधिग्रहण सीएनटी एक्ट की अनदेखी कर किया गया, जो स्पष्ट रूप से गैरकानूनी है।
परिषद का कहना है कि अगर इस भूमि पर 'रिम्स-2' जैसे किसी नए प्रोजेक्ट के लिए कब्जा किया जाता है, तो नगड़ी के आदिवासी पूरी तरह से भूमिहीन हो जाएंगे। यह संविधान की पांचवीं अनुसूची और CNT एक्ट दोनों का उल्लंघन है, जिनका उद्देश्य आदिवासियों की जमीन की रक्षा करना है।

भूमि वापसी की कानूनी व्यवस्था
प्रेस विज्ञप्ति में यह भी उल्लेख किया गया कि भूमि अधिग्रहण अधिनियम 1894 की धारा-48(1) के तहत, यदि अधिग्रहित भूमि का उपयोग तय उद्देश्य के लिए नहीं हुआ हो, तो उसे भू-स्वामियों को लौटाया जा सकता है। 1979 में तत्कालीन बिहार सरकार के विशेष सचिव द्वारा इस आशय का पत्र भी जारी किया गया था। परिषद ने राज्य सरकार से मांग की है कि वह नगड़ी मौजा की जमीन के मामले में न्यायपूर्ण निर्णय लेते हुए इसे मूल भू-स्वामियों को वापस करे। अन्यथा यह मामला व्यापक जनआंदोलन और कानूनी संघर्ष का रूप ले सकता है।
