जीतेंद्र कुमार
अभी यह हंसुआ के विवाह में खुरपी के गीत के समान है। क्योंकि पूरी सरकार और राज्य के सभी राजनीतिक दल फिलहाल छात्र आंदोलन में उलझे हुए हैं। उसमें एक अदना-सा कर्मचारी की कहानी बताना सूरज को दीपक दिखाने के समान है। लेकिन इस छोटे-से कर्मचारी के प्रभाव और दबाव को देखते हुए कार्मिक जैसे विभाग की मजबूरी और दोहरी नीति उजागर हो जाती है। कार्मिक का बौनापन सामने आ जाता है। एक कर्मचारी किस तरह पूरे कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग पर भारी है। जहां पूरा सचिवालय सेवा संघ अपनी शर्तों पर झुकने के लिए कार्मिक को टस से मस नहीं कर पा रहा है, वहीं एक साधारण-सा कर्मचारी कार्मिक को अपनी उंगली पर नचा रहा है।
नाम संजय है। नाम का प्रभाव आप जानते भी होंगे। महाभारत में संजय के प्रभाव और विलक्षण प्रतिभा को पूरी दुनिया समझ चुकी है। फिर संजय यहां भी अपनी उसी विलक्षण प्रतिभा को दिखा रहा है। कहानी तत्कालीन ग्रामीण विकास मंत्री नीलकंठ सिंह मुंडा से शुरू होती है। संजय मुंडा जी के सेल में जुगाड़ बैठा लिया। बाद में मुंडा जी मंत्री पद से हट गए। आलमगीर आलम ग्रामीण विकास मंत्री बने। संजय बाबू वहीं पदस्थापित रह गए। समय के प्रवाह में आलम जी भी हट गए। अंसारी जी आए। अंसारी जी के साथ भी चौधरी जी रह गए। अब संयोग देखिए, 2024 के विधानसभा चुनाव के बाद अंसारी जी भी ग्रामीण विकास विभाग से स्वास्थ्य में चले गए। लेकिन संजय बाबू का प्रभाव और दबदबा देखिए, वे ग्रामीण विकास में पदस्थापित रहते हुए भी स्वास्थ्य विभाग का स्वास्थ्य लाभ लेते रहे।.jpeg)
जब दीपिका पांडे ग्रामीण विकास मंत्री बनीं, तो कई तरह के आरोप संजय बाबू पर लगे। मंत्री ने पहले तो कार्मिक को उन आरोपों की जांच करने के लिए लिखा। लेकिन जब कार्मिक में कोई कार्रवाई नहीं की गई, तो जुलाई में ग्रामीण विकास विभाग ने चौधरी जी की सेवा कार्मिक को लौटा दी। लेकिन प्रभाव और ताकत देखिए, संजय कार्मिक में पदस्थापित रहते हुए भी काम स्वास्थ्य विभाग में मंत्री जी के बगल में बैठकर कर रहे हैं। नियम-कानून और संविधान की शपथ लेने वाले मंत्री जी को भी यहां कोई त्रुटि, अनियमितता या गड़बड़ी नहीं दिखाई पड़ रही है, क्योंकि उन्हें अपने दूसरे कार्यों में संजय के अनुभव का पूरा लाभ मिल रहा है। प्रत्येक रविवार को पढ़े सत्ता और सचिवालय का सच 