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जामताड़ा : सड़क के लिए तरस रहा शतसाल नीचे टोला, ग्रामीणों का ऐलान- रोड नहीं, तो वोट नहीं

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दीपक झा/जामताड़ा
जामताड़ा प्रखंड के गोपालपुर पंचायत स्थित शतसाल नीचे टोला के ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। करीब 600 की आबादी वाला यह टोला पक्की सड़क के अभाव में विकास की मुख्यधारा से पूरी तरह कटा हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि वर्षों से सड़क निर्माण की मांग की जा रही है, लेकिन अब तक उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है। बरसात के मौसम में हालात और भी बदतर हो जाते हैं, जब गांव की कच्ची सड़क दलदल और तालाब का रूप ले लेती है। ग्रामीणों के अनुसार बारिश शुरू होते ही तीन से चार महीनों तक शतसाल नीचे टोला का संपर्क जिला मुख्यालय और आसपास के इलाकों से लगभग टूट जाता है। सड़क पर कीचड़ और जलजमाव के कारण लोगों का आवागमन मुश्किल हो जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में गांव की स्थिति किसी नरक से कम नहीं रहती और दैनिक जरूरतों को पूरा करना भी चुनौती बन जाता है।

बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य सेवाएं हो रही प्रभावित
सड़क नहीं होने का सबसे ज्यादा असर बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ रहा है। कीचड़ भरे रास्तों के कारण कई बच्चे महीनों तक स्कूल नहीं जा पाते। वहीं किसी के बीमार पड़ने पर स्थिति गंभीर हो जाती है। गांव तक एम्बुलेंस या अन्य वाहन नहीं पहुंच पाते, जिससे मरीजों को खटिया पर लादकर मुख्य सड़क तक ले जाना पड़ता है। कई बार समय पर इलाज नहीं मिलने से मरीजों की जान तक खतरे में पड़ जाती है।

चुनाव में वादे, बाद में उपेक्षा का आरोप
ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि चुनाव के समय नेता, विधायक और सांसद गांव पहुंचकर सड़क निर्माण का आश्वासन देते हैं। कई बार अधिकारियों को फोन कर कार्रवाई का भरोसा भी दिलाया जाता है, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही सभी वादे हवा हो जाते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों के समक्ष समस्या उठाने के बावजूद कोई ठोस पहल नहीं की गई।

पंचायत चुनाव बहिष्कार की चेतावनी
लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने अब आर-पार की लड़ाई लड़ने का फैसला किया है। ग्रामीणों ने एकजुट होकर ‘रोड नहीं, तो वोट नहीं’ का नारा दिया है। उनका कहना है कि यदि आगामी पंचायत चुनाव से पहले सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं किया गया, तो पूरा टोला मतदान का बहिष्कार करेगा। ग्रामीणों के मुताबिक अब अपनी आवाज शासन-प्रशासन तक पहुंचाने के लिए उनके पास यही अंतिम विकल्प बचा है।
 

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