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सचिवालय का सच : काश दंड की यह व्यवस्था यहां भी होती

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जीतेंद्र कुमार

किसी को दंड मिले या वह दोष मुक्त हो, सचिवालयी प्रक्रिया पर अक्सर सवाल उठाया जाता रहा है।  किसी को बचाने का आरोप लगता है तो किसी को इंटेनशनली दंडित करने का। कभी कभी तो विभागीय कार्यवाही या जांच प्रक्रिया इतनी लंबी खींच जाती है कि न्याय की आत्मा ही मरने लगती है। न्याय का पहला ही सोपान है समय से फैसला। लेकिन सचिवालय तो सचिवालय है। यहां सब कुछ चलता है। कभी निर्णय की प्रक्रिया को उलझाया जाता है तो कभी लटकाया जाता है। कभी फाइलें आलमीरे में बंद कर दी जाती है तो कभी छोटा बाबू फाइल इसलिए नहीं बढ़ाते कि बड़ा बाबू ने फाइल बढ़ाने का निर्देश ही नहीं दिया है। तरह तरह के खेल चलते रहते हैं। छोटे छोटे आरोपों के निष्पादन में भी लंबा लंबा समय लगता है। मसलन संचिका दबाने,ड्युटी से गायब रहने, छोटे छोटे आर्थिक अपराध करने, पत्र गायब, इंदिरा आवास के आवंटन या लाभुक चयन में गड़बड़ी करने जैसे आरोपों पर भी निर्णय करने में वर्षों लगा दिए जाते हैं। काश, हमारी सरकार भी छोटे छोटे आरोपों के लिए भारतीय रेलवे से कुछ सीखने की इच्छा रखती। जहां बगैर दंड के भी ऐसा दंड दिया जाता है, जहां रेलवे कर्मी फिर कभी उस तरह की गलती नहीं करने की कसम खा बैठता है।


भारतीय रेलवे में एक पद है, वरीय मंडल परिचालन प्रबंधक(एसडीओएम) का। इनकी मुख्य जिम्मेवारी ट्रेनों सही परिचालन कराना है। इनके ही क्षेत्राधिकार में ड्राइवर, गार्ड और स्टेशन मास्टर होते हैं। अब ट्रेनों का परिचालन समय और निर्बाध रूप से होता रहे, इसके लिए जरूरी है कि ड्राइवर, गार्ड और स्टेशन मास्टर के साथ साथ इनसे जुड़े अन्य कर्मी सही से अपनी ड्युटी करें। मालूम है, रेलवे के इन कर्मियों को छोटे-छोटे अपराध या गलती के लिए कैसे सजा दी जाती है। लेकिन यहां दुहराना जरूरी है कि केवल छोटी गलतियों के लिए। आरोप लगने के बाद रेलवे के संबंधित कर्मी को बुकअप कर दिया जाता है। बुकअप होने का मतलब है कि उसे तय समय पर वरीय मंडल परिचालन प्रबंधन के पास तय ड्रेस में जाना है। वहां पहुंच कर एसडीओएम के कार्यालय कक्ष के बाहर बैठे पीऊन को बताना है कि वह आ गए हैं। पीऊन साहब को जाकर जानकारी दे देता है कि अमुक बुकअप कर्मी आ गए हैं। साहब अपने पीऊन को कुछ निर्देश दे देते हैं। पीऊन बाहर आकर संबंधित बुकअप रेलकर्मी को बैठ जाने का सुझाव दे देता है।


अब शुरू होता है दंडित करने की प्रक्रिया। बुकअप रेल कर्मी एसडीओएम कार्यालय कक्ष के बाहर बने एक विशेष स्टूल, जिसे बुकअप कर्मियों के बैठने के लिए ही विशेष रूप से बनाया गया है, उस पर बैठ जाता है। साहब के बुलाने का इंतजार करता रहता है। साहब उस कर्मी को इंतजार कराते जाते हैं। पास से गुजरनेवाला रेलवे का कोई कर्मी या अधिकारी, बुकअप कुर्सी पर बैठे कर्मी को देख या तो हंसता है या फिर पूछ बैठता है, क्या गलती की है। वह शर्माता है, कुछ जवाब नहीं दे पाता है। या फिर बताता है कि उससे छोटी सी गलती या भूल हो गयी थी। दिन भर वह उसी बुकअप कुर्सी पर बैठा बैठा अपने को अपमानित महसूस करता रहता है। भूख लगने पर या प्यास लगने पर वह कभी कभी कुछ मिनटों के लिए बुकअप कुर्सी से उठ कर इधर उधर जाने को विवश भी होता है।


जब उस रेल कर्मी के रूट का अंतिम ट्रेन आने का समय नजदीक होता है, साहब उसे बुलाते हैं। पूछते हैं तुम बीच में कहां चले गए थे। मैंने तुम्हें बुलाया, तुम बुकअप कुर्सी पर थे ही नहीं। कभी कभी साहब इस लहजे में भी फटकारते हैं-क्या एसडीओएम आपके अनुसार मिलेगा, मेरे पास कोई दूसरा काम नहीं है। जब मुझे समय मिलेगा तभी तो तुम्हें बुलाएंगे, जाओ कल आना। इस तरह वह बुकअप रेलकर्मी वहां से भागते भागते अपने रुट का अंतिम ट्रेन पकड़ता है। अपने घर चला जाता है। दरअसल पीऊन को साहब का निर्देश दिया रहता है कि कब बुकअप रेलकर्मी अपनी कुर्सी से उठ कर और कितनी देर के लिए गायब हुआ है, इसका वह समय नोट करता रहता है। दूसरे दिन बुकअप कर्मी फिर एसडीओएम के कार्यालय कक्ष के बाहर आकर उसी तरह बुकअप कुर्सी पर दिन भर बैठता है। बगल से गुजरने वाले अन्य रेलकर्मी उसे देख कर उसी रह हंसते हैं, मजाक उड़ाते हैं। बुकअप कर्मी दूसरे दिन भी शर्मिंदा होता रहता है। फिर कभी कोई गलती नहीं करने की कसम खाता रहता है। अंत में जब दूसरे या तीसरे दिन साहब से मुलाकात और बात होती है तो साहब के फटकार और फिर कभी गलती नहीं करने की चेतावनी के साथ उस रेल कर्मी को दोष मुक्त कर दिया जाता है। लेकिन दोष मुक्त किए जाने की यह प्रक्रिया इतनी कष्टदायक और अपमानजनक होती है कि रेलकर्मी भविष्य में फिर गलती या भूल नहीं करने की कोशिश करता है। दूसरे रेलकर्मी भी इससे सीख लेते हैं।


अब काश राज्य सरकार में भी दंडित करने की कोई इसी तरह की प्रक्रिया होती। बीडीओ साहब, सीओ साहब या राज्य प्रशासनिक सेवा के अन्य अधिकारी छोटी-छोटी गलतियों के लिए बुकअप किए जाते। मुख्य सचिव कार्यालय कक्ष के बाहर बनी बुकअप कुर्सी पर वे दिन भर बैठाए जाते। अन्य सेवाओं के अधिकारियों के लिए भी इसी तरह की कोई दूसरी प्रक्रिया होती। शायद ही वे फिर भविष्य में छोटी मोटी गलतियां, अपराध या भ्रष्टचार को अंजाम देते। क्योंकि व्यहार में सचिवालयी व्यवस्था में दंडित करने की जो प्रक्रिया है, उसमें समय जाया होने के अलावा कुछ नहीं होता। अक्सर वर्षों तक चली विभागीय जांच या कार्यवाही के बाद संबंधित आरोपी अक्सर दोष मुक्त ही करार दिया जाता है। अगर वह दोषी करार भी दिया गया तो 90 फीसदी मामलों में उसे हाईकोर्ट से दोष मुक्ति मिल जाती है। इस तरह जांच और विभागीय कार्यवाही का अंतिम परिणाम, ठन ठन गोपाल होता है।

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