द फॉलोअप, रांची
झारखंड में वर्षों से चल रहे भूमि सर्वेक्षण कार्य को झारखंड हाईकोर्ट ने अब गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है। हाईकोर्ट इसको लेकर लगातार सरकार को फटकार लगा रहा है। झारखंड में चल रहे भूमि सर्वेक्षण को लेकर दायर जनहित याचिका पर सोमवार को झारखंड उच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने राजस्व, निबंधन एवं भूमि सुधार विभाग की कार्यप्रणाली पर नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब पिछली सुनवाई में विभाग के सचिव को व्यक्तिगत रूप से जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया गया था, तो उनकी जगह विभागीय अवर सचिव ने शपथ पत्र क्यों दाखिल किया।

मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए विभाग के सचिव को निर्देश दिया कि वे स्वयं 15 जुलाई तक शपथ पत्र दाखिल करें। अदालत ने यह भी कहा कि यदि पिछली सुनवाई के बाद इस मामले में कोई नई प्रगति हुई है, तो उसकी विस्तृत जानकारी भी शपथ पत्र में उपलब्ध कराई जाए। खंडपीठ ने राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को भी कहा कि झारखंड के सभी जिलों में भूमि सर्वेक्षण का कार्य कब तक पूरा हो जाएगा। अदालत ने इस संबंध में विस्तृत समय-सीमा प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को निर्धारित की गई है।
राज्य के किस जिले में कब हुआ लास्ट लैंड सर्वे सेट्लमेंट
झारखंड में "अंतिम भूमि सर्वे (Revisional Survey/Settlement)" एक ही वर्ष में नहीं हुआ था। अलग-अलग जिलों में अलग-अलग समय पर अंतिम सर्वे एवं सेटलमेंट हुआ। रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा जैसे कई ऐसे जिले हैं जहां अंतिम सर्वे सेट्लमेंट 1935 में हुआ।
जिला अंतिम प्रमुख भूमि सर्वे/रिवीजनल सर्वे
रांची 1927–1935
खूंटी 1927–1935
गुमला 1927–1935
लोहरदगा 1927–1935
सिमडेगा 1927–1935
पश्चिमी सिंहभूम 1960–1964 (आजादी के बाद अंतिम सर्वे)
पूर्वी सिंहभूम 1934–1938
सरायकेला-खरसावां 1958–1995 (दूसरा रिवीजन सर्वे)
हजारीबाग 1995
चतरा 1995
कोडरमा 1995
गिरिडीह 1995
रामगढ़ 1995

जिन जिलों में अलग सर्वे नहीं हुआ
आज के कई जिले (जैसे धनबाद, बोकारो, देवघर, दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज, जामताड़ा, पलामू, गढ़वा, लातेहार आदि) पुराने बड़े जिलों से बने हैं। इन क्षेत्रों में वर्तमान जिला बनने से पहले संबंधित पुराने जिले के सर्वे रिकॉर्ड लागू रहे, इसलिए इनके लिए अलग "अंतिम सर्वे वर्ष" नहीं मिलता। अधिकांश छोटानागपुर क्षेत्र में अंतिम प्रभावी रिवीजनल सर्वे 1927–1935 के बीच पूरा हुआ। पश्चिमी सिंहभूम में आजादी के बाद 1960–1964 के बीच सर्वे हुआ। हजारीबाग प्रमंडल के कई क्षेत्रों (आज के हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, गिरिडीह और रामगढ़) में पहला रिवीजनल सर्वे 1995 में पूरा हुआ। 1972–1982 के दौरान शुरू किया गया सर्वे तत्कालीन बिहार सरकार ने 1982 में रद्द कर दिया था, इसलिए वह अंतिम वैध सर्वे नहीं माना जाता।
सर्वे सेट्लमेंट के लाभ
जमीन का अंतिम सर्वे सेट्लमेंट होने के कई लाभ हैं। एक ही जमीन की बार-बार होनेवाली खरीद बिक्री के बाद भी वह खतियान में सबसे पुराने रैयत के नाम ही दर्ज रहता है। इससे कई तरह की परेशानी खड़ी होती है। जमीन विवाद के अधिकतर मामले सर्वे सेट्लमेंट से दूर हो जाते हैं। जमीन के पारिवारिक बंटवारे का विवाद भी कम होता है। खतियान में रैयत के वर्तमान पीढ़ी का नाम होने से भी आपसी विवाद कम होता है।
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