जीतेंद्र कुमार
प्रोजेक्ट भवन में सरकार का एक कोर डिपार्टमेंट है। वह बजबजा रहा है। उसके सड़ांध से दूसरे विभाग भी तौबा-तौबा कर रहे हैं। फाइल को दबा देना, नाम को लटका देना, यहां यह आम बात है। स्थानांतरण-पोस्टिंग की शर्तें बनाना, अगले ही दिन उसे बदल देना, कोई नयी बात नहीं रह गयी है। पिछले ही दिनों राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के ट्रांसफर-पोस्टिंग के समय शर्तें कुछ और तय की गयी, बड़े साहब का दबाव पड़ा तो शर्तें सुविधाजनक बन गयीं। बताते हैं कि प्रथम बैच के प्रमोशन में गांधी जी का प्रभाव जम कर बोला। फिर प्रभाव का ही कमाल रहा कि कुछ लोगों को एसडीएम रैंक में प्रमोशन मिल तो कुछ लोग नीचले ही ग्रेड में छोड़ दिए गए।

कोर्ट के आदेशों की व्याख्या मनमाफिक होने लगी है। प्रभाव और ऊपर का दबाव यहां सिर चढ़ कर बोल रहा है। गांधी जी ने अपना करामात दिखाया तो नियम और शर्तें तत्काल ढीली हो जाती हैं। उसे अनुकूल बना दी जाती हैं। लेकिन चढ़ावे में खोट रहा तो नियमानुकूल मामलों में भी निरीह व्यक्ति परेशान दिखता है। सबसे दिलचस्प यह है कि ऊपर के प्रभाव और दबाव के बाद भी फाइलें तब तक नहीं सरकती है जब तक चढ़ावा चढ़ नहीं जाता है। इस खेल में कभी प्रतीक के तौर पर आग का नाम लिया जाता है तो कभी होराई को गुरु बताया जाता है। सब कुछ सेट है।

नीम पर करैला यह है कि बड़े साहब सुनने को तैयार ही नहीं हैं। उनके दरवाजे आम अधिकारियों-कर्मियों के लिए बंद कर दिए गए हैं। उससे ऊपर के साहब, कमोवेश खुद शर्तों के उलटफेर कराने में लगे रहते हैं। सरकार के आदेशों का अनुपालन कराने के क्रम में अपना भी गोटी फिट करने के जुगाड़ में लगे रहते हैं। इस तरह सिस्टम को सुधारने और पारदर्शिता को स्थापित कराने की क्षमता रखने वाला यह विभाग, खुद सिस्टम की मार झेल रहा है। कार्यपालिका के मंदिर में सड़ांध पैदा कर रहा है।
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