द फॉलोअप टीम
किसी के लिए हरि सर,
किसी के लिए हरि भैया,
किसी के लिए हरि भाई...
रांची के पत्रकारिता जगत में वरिष्ठ पत्रकार हरिनारायण सिंह सिर्फ अपने पद या पहचान के लिए नहीं, बल्कि अपने आत्मीय व्यवहार, सादगी और स्नेह से भरे संबोधनों के लिए जाने जाते थे। आज उनके निधन की खबर ने पूरे पत्रकारिता समाज को झकझोर कर रख दिया है। सोशल मीडिया पर उनकी यादों का सैलाब उमड़ पड़ा है – हर कोई उन्हें अपने अपने अंदाज़ में याद कर रहा है, मानो कोई अपना बिछुड़ गया हो।
झारखंड की पत्रकारिता में अगर किसी एक नाम को मार्गदर्शक, संरक्षक और प्रेरणास्रोत के रूप में सदैव याद किया जाएगा, तो वह नाम होगा हरिनारायण सिंह का।
आज वे हमारे बीच नहीं हैं। वे लगभग एक माह से बीमार थे। बिना कोई शोर किए, चुपचाप इस दुनिया से विदा ले ली।
पर उनकी मुस्कान, उनका संकल्प, और उनके दिए हुए मूल्य – हमेशा इस मिट्टी में जीवित रहेंगे, हर पत्रकार के भीतर एक उम्मीद की तरह धड़कते रहेंगे।
हरि सर ने पत्रकारिता की शुरुआत रांची की धरती से की थी, और अपने आख़िरी क्षण भी यहीं बिताए। उन्होंने उस दौर में कलम उठाई थी जब पत्रकारों की पहचान सीमित थी, संसाधन नगण्य थे, और सच्चाई की कीमत चुकानी पड़ती थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी – न सम्मान से समझौता किया, न मूल्य से पीछे हटे।
जब पत्रकारिता व्यवसाय बनने लगी, तब हरि सर ने इसे मिशन बनाए रखा। उन्होंने अपने फैसलों से न सिर्फ खुद की राह तय की, बल्कि दर्जनों पत्रकारों को नया जीवन, नया मंच और नया आत्मविश्वास दिया। प्रभात खबर से हिंदुस्तान की ओर उनका कदम, उनके अकेले का नहीं था – वह एक पूरी टीम और कहें तो पीढ़ी को दिशा देने वाला निर्णय था। उन्होंने पत्रकारिता को "नौकरी" से "जिम्मेदारी" की ओर मोड़ा।
हरि सर सिर्फ पत्रकार नहीं थे – वे संघर्ष का चेहरा, संवाद का पुल और आत्मीयता की मिसाल थे। पत्रकारों के वेतन से लेकर उनकी गरिमा तक की लड़ाई में वे सबसे आगे खड़े रहे। प्रिंट मीडिया में वेतन-सुधार की जो लहर आयी, उसमें उनका नेतृत्व निर्णायक था।
उनका योगदान केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं रहा। राजनीति के गलियारों में उन्होंने कई युवाओं को दिशा दी, और छोटे व्यापारियों को बड़े सपनों की उड़ान दी। वे दृढ़ता और विनम्रता का वह दुर्लभ संगम थे, जो हर किसी में नहीं होता। आज रांची के मुक्तिधाम घाट पर उनका अंतिम संस्कार 4 बजे शाम को होगा।
आज वे भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन
उनकी कहानियाँ हैं,
उनकी दी हुई सीखें हैं,
और सबसे बढ़कर – उनकी बनाई हुई वह मजबूत नींव है, जिस पर झारखंड की पत्रकारिता आज खड़ी है।
हरि सर,
झारखंड की पत्रकारिता आपको कभी नहीं भूलेगी।
आपका नाम सिर्फ इतिहास में नहीं, बल्कि हर पत्रकार के दिल में दर्ज रहेगा।
आपको शत-शत नमन। विनम्र श्रद्धांजलि।
