द फॉलोअप डेस्क
करीब चार दशक तक झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बिहार के जंगलों में सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने रहे शीर्ष माओवादी नेता मिसिर बेसरा आखिरकार कानून के शिकंजे में आ गए। एक करोड़ रुपये के इनामी इस माओवादी कमांडर की गिरफ्तारी को झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चल रहे अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार, धनबाद से गिरफ्तार किए गए मिसिर बेसरा के साथ कुख्यात माओवादी मोछू और संगठन के कई अन्य सदस्य भी सुरक्षा एजेंसियों की गिरफ्त में हैं। फिलहाल सभी से गुप्त स्थान पर पूछताछ की जा रही है। माना जा रहा है कि इस गिरफ्तारी से न केवल कोल्हान बल्कि पूरे पूर्वी भारत में माओवादी संगठन की कमान और उसकी रणनीतिक क्षमता को बड़ा झटका लगेगा।
एक छात्र से बना देश का सबसे वांछित माओवादी
मिसिर बेसरा का वास्तविक नाम भास्कर बेसरा बताया जाता है। वह झारखंड के गिरिडीह जिले का रहने वाला है। उसने धनबाद के पी.के. रॉय मेमोरियल कॉलेज से पढ़ाई की थी। छात्र जीवन के दौरान ही वह वामपंथी उग्र विचारधारा से प्रभावित हुआ और धीरे-धीरे भूमिगत गतिविधियों से जुड़ गया। 1980 के दशक में उसने हथियार उठा लिए और इसके बाद कभी सामान्य जीवन में वापस नहीं लौटा। मिसिर बेसरा धीरे-धीरे माओवादी संगठन की सैन्य इकाई का प्रमुख रणनीतिकार बन गया। संगठन में उसकी क्षमता, जंगलों की गहरी समझ और गुरिल्ला युद्ध की रणनीति ने उसे शीर्ष नेतृत्व तक पहुंचा दिया। बाद में वह भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो का सदस्य बना और केंद्रीय सैन्य आयोग में भी उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
लाल गलियारे का सबसे खतरनाक रणनीतिकार
सुरक्षा एजेंसियां मिसिर बेसरा को केवल एक माओवादी कमांडर नहीं, बल्कि संगठन का मास्टर स्ट्रेटेजिस्ट मानती रही हैं। वह सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नजर रखने, नए ठिकाने विकसित करने, हथियारों की आपूर्ति सुनिश्चित करने, आईईडी बिछाने, घात लगाकर हमले करने और नए कैडरों को प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी संभालता था। झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जंगलों में सक्रिय अधिकांश बड़ी सैन्य गतिविधियों के पीछे उसका नाम सामने आता रहा। कोल्हान, सारंडा, पोड़ाहाट और आसपास के घने जंगल वर्षों तक उसके सबसे सुरक्षित ठिकाने माने जाते रहे। 
पुलिस गिरफ्त में आया... फिर फिल्मी अंदाज में फरार
साल 2007 में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर माओवादियों ने हमला कर अपने कई साथियों को छुड़ा लिया। इसी दौरान मिसिर बेसरा भी पुलिस हिरासत से फरार हो गया। इसके बाद उसने करीब डेढ़ दशक तक सुरक्षा एजेंसियों को लगातार चकमा दिया। उसकी तलाश में झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में केंद्रीय एजेंसियां लगातार अभियान चलाती रहीं, लेकिन वह हर बार जंगलों के रास्ते निकल जाता था।
कोल्हान बना आखिरी गढ़
पिछले कई वर्षों से पश्चिमी सिंहभूम का सारंडा और कोल्हान क्षेत्र उसका सबसे बड़ा सुरक्षित ठिकाना माना जाता था। यहां उसने भूमिगत बंकर, हथियारों के भंडार, संचार तंत्र और प्रशिक्षण शिविर विकसित किए थे। सुरक्षा बलों ने पिछले दो वर्षों में लगातार अभियान चलाकर इन बंकरों को ध्वस्त किया। सैकड़ों आईईडी बरामद किए गए। हथियारों का बड़ा जखीरा नष्ट किया गया और कई सहयोगियों को गिरफ्तार किया गया। इसका सीधा असर संगठन की सैन्य क्षमता पर पड़ा। साल 2007 में पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था। लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर पर माओवादियों ने हमला कर अपने कई साथियों को छुड़ा लिया। इसी दौरान मिसिर बेसरा भी पुलिस हिरासत से फरार हो गया। इसके बाद उसने करीब डेढ़ दशक तक सुरक्षा एजेंसियों को लगातार चकमा दिया। उसकी तलाश में झारखंड, बिहार, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में केंद्रीय एजेंसियां लगातार अभियान चलाती रहीं, लेकिन वह हर बार जंगलों के रास्ते निकल जाता था।.jpeg)
लगातार टूटता गया संगठन
एक समय था, जब मिसिर बेसरा के नेतृत्व में सैकड़ों सशस्त्र माओवादी जंगलों में सक्रिय थे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तस्वीर तेजी से बदलती चली गई। कई शीर्ष कमांडर मारे गए। दर्जनों नक्सलियों ने आत्मसमर्पण कर दिया। हथियारों की आपूर्ति बाधित हो गई। लेवी वसूली का नेटवर्क कमजोर पड़ गया। ऐसे में नक्सलियों का स्थानीय समर्थन भी लगातार कम होता गया। वहीं, सुरक्षा एजेंसियों का दबाव बढ़ने के साथ संगठन के भीतर भी नेतृत्व और रसद का संकट गहराने लगा।
एक करोड़ का इनामी
झारखंड सरकार ने मिसिर बेसरा पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित कर रखा था। वह देश के सबसे अधिक इनामी माओवादी नेताओं में शामिल था। उसके खिलाफ हत्या, पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों पर हमले, विस्फोट, लेवी वसूली, रंगदारी, अपहरण, हथियारबंद षड्यंत्र और गैरकानूनी गतिविधियों से जुड़े अनेक मामले विभिन्न राज्यों में दर्ज हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले दो वर्षों में जिस तेजी से सुरक्षा बलों ने कोल्हान क्षेत्र में अभियान चलाया, उससे माओवादी संगठन का पूरा ढांचा बिखर गया। लगातार आत्मसमर्पण, बंकरों के ध्वस्तीकरण और आपूर्ति तंत्र के खत्म होने के बाद मिसिर बेसरा का नेटवर्क लगभग अलग-थलग पड़ गया था। खुफिया एजेंसियों को उसके गिरिडीह-धनबाद क्षेत्र में होने की सूचना मिली। इसके बाद चलाए गए विशेष अभियान में उसे उसके साथियों सहित गिरफ्तार कर लिया गया।
झारखंड के लिए एक निर्णायक क्षण
करीब चालीस वर्षों तक जिस नाम का खौफ जंगलों से लेकर सुरक्षा एजेंसियों तक महसूस किया जाता था, वह अब गिरफ्तारी के साथ एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। यदि पूछताछ में उससे संगठन की संरचना, हथियारों के भंडार, आर्थिक नेटवर्क और शहरी संपर्कों से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिलती हैं, तो यह झारखंड ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वी भारत में नक्सल विरोधी अभियान की दिशा बदल सकती है। मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी केवल एक वांछित माओवादी के पकड़े जाने की घटना नहीं है, बल्कि यह उस दौर के अंत का संकेत भी मानी जा रही है, जिसने दशकों तक लाल आतंक के साये में हजारों परिवारों, गांवों और सुरक्षा बलों को प्रभावित किया।