द फॉलोअप, रांची
हाल में बिहार, पश्चिम बंगाल और असम में रिकार्ड जीत का परचम लहराने वाली भाजपा को बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव ने करारा झटका दिया है। भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार 19 हजार से अधिक मतों से जनसुराज पार्टी के प्रसांत किशोर से हार गए हैं। प्रशांत किशोर की इस जीत ने कई संदेश भी दिए हैं। किसी को भी भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना कर चुनावी खेत को जोत लेने की दबंगई मुंह खाने चित हुई है। सामाजिक समीकरण ध्वस्त हुए हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के चयन पर सवाल खड़ा हो गया है। राजद का वोट बैंक दरका है तो सम्राट चौधरी को बिहार की बागडोर सौंपे जाने पर भी प्रश्न चिन्ह लगा है। इस पूरे प्रकरण में बिहार को प्रशांत किशोर सरीखे एक नया लीडर मिल गया है। इन सबों के बीच प्रशांत किशोर की जीत के तीन-चार प्रमुख कारण स्पष्ट रूप से दिखने लगे हैं। चुनाव के समय जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन का असर। भरत तिवारी का इनकाउंटर। मुसलिम और गैर कुरमी, गैर कोयरी मतदाताओं का जन सुराज पार्टी की ओर झुकाव। इस बदलाव ने भाजपा के चुनावी गणित को मरोड़ कर रख दिया। इस तरह जंतर-मतर के बाद बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव परिणाम ने स्पष्ट रूप से यह भी संदेश दिया है कि आम लोगों में व्यवस्था के प्रति असंतोष की आग सुलग रही है। जनता अब भ्रष्टाचार पर वार और व्यवस्थागत बदलाव चाहती है।

पिता नवीन किशोर प्रसाद के 2026 में निधन के बाद से नितिन नवीन का बांकीपुर विधानसभा सीट पर कब्जा रहा है। उससे पहले नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा खुद यहां से कई बार विधायक चुने गए थे। बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र में कायस्थ मतदाताओं की सबसे अधिक संख्या बतायी जाती है। इसके बाद ब्राह्मण और भूमिहारों की भी अच्छी संख्या है। पिछड़े, दलित और मुसलिम मतदाता, प्रभावी भूमिका में नहीं है। लेकिन इनकी एकजुटता ने समीकरण बदलने का काम किया। भरत तिवारी इनकाउंटर के कारण ब्राह्मण मतदाताओं का झुकाव प्रशांत किशोर की ओर गया। भूमिहार और अपर कास्ट की अन्य जातियां भाजपा को विजयश्री दिलाने का ठेका, इस बार नहीं ली। मुसलिम मतदाताओं ने भाजपा उम्मीदवार को हराने वाली पार्टी को पहचानने में तनिक भी भूल नहीं की। इसी उद्देश्य से वे राजद छोड़ प्रशांत किशोर के साथ हो गए। इस तरह ब्राह्मण मतदाताओं के साथ मुसलिम और पिछड़े मतदाताओं का स्पष्ट झुकाव परिणाम को उलट दिया। प्रशांत किशोर को एक रणनीतिकार से राजनेता बना दिया।

बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव के परिणाम ने भाजपा को कई और भी संदेश दिए हैं। यह भाजपा का गढ़ रहा है। राजधानी पटना के इस शहरी गढ़ में भाजपा की हार असर पूरे राज्य में पसर सकता है। बिहार में भाजपा के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह पहला चुनाव था। भाजपा की हार हुई। इससे अब सम्राट चौधरी के नेतृत्व पर भी सवाल खड़ा हो गया है। स्वजातीय मतदाताओं की परिधि से बाहर के मतदाताओं का उन पर अविश्वास का संकट झलका है। उच्च वर्ग के मतदाताओं का सम्राट चौधरी के प्रति सहानुभूति का अभाव साफ हुआ है।
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अब प्रशांत किशोर की इस जीत में उनकी चार साल से की जा रही पदयात्रा और जमीनी संपर्क भी काम आया है। परंपरागत राजनीति से इतर मतदाताओं ने बिहार में एक नये विकल्प का इजाद किया है। बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्र में विकास, शिक्षा, रोजगार और प्रशासन जैसे मुद्दों पर लड़े गए इस चुनाव ने यह भी स्पष्ट किया है कि आम जनता वर्तमान व्यवस्था और सरकार से असंतुष्ट है। इस कारण प्रशांत किशोर की साफ-सुधरी छवि ने मतदाताओं को प्रभावित किया। इस क्रम में अब प्रशांत किशोर के लिए भी कई तरह की चुनौती है।
राष्ट्रीय स्तर पर सफल चुनावी रणनीतिकार की छवि और साफ-सुथरे प्रशासन का वादा भी कई मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है। अब प्रशांत किशोर के लिए एक सीट की छवि को पूरे बिहार में विस्तार देना और विधानसभा में विपक्ष की प्रभावी भूमिका निभाने की चुनौती होगी। राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन की राजनीति में शामिल होने से पहले फूंक फूंक कर कदम बढ़ाना होगा।
