द फॉलोअप डेस्क
मानसून की पहली बारिश में 19 जून 2025 को खूंटी-तोरपा-कोलेबिरा पथ के बनई नदी पर बना उच्च गुणवत्ता का पुल धंस गया। पथ निर्माण विभाग ने घटना के तत्काल बाद एनएच के चीफ इंजीनियर अभिनेंद्र कुमार के नेतृत्व में एक जांच कमेटी का गठन किया। इस कमेटी में अधीक्षण अभियंता नवल किशोर, कार्यपालक अभियंता आकाश कुमार बादल को शामिल किया गया। दोषी अभियंताओं को बचाने की पूरी कोशिश की गयी। पथ निर्माण विभाग द्वारा अभिनेंद्र कुमार को जांच रिपोर्ट सौंपने के लिए बार-बार स्मार पत्र दिया गया। अंततः अभिनेंद्र कुमार ने अपनी रिपोर्ट पथ निर्माण विभाग को सौंप दी। आधिकारिक जानकारी के अनुसार उस रिपोर्ट में पुल निर्माण के समय कार्यरत अभियंताओं को दोषी बताया गया है। कमेटी ने संबंधित अभियंताओं को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए आगे की कार्रवाई करने की अनुशंसा की है। लेकिन रिपोर्ट सौंपे जाने के 15 दिनों बाद भी उस पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। जांच रिपोर्ट पर विभाग बैठ गया है। साथ ही दोषी अभियंताओं को बचाने की अभी भी पूरी कोशिश हो रही है।

कौन थे पुल निर्माण करानेवाले अभियंता
मालूम हो कि 2006 से 2009 के बीच खूंटी-तोरपा-कोलेबिरा पथ के बनई नदी पर उच्च गुणवत्ता का पुल निर्मित हुआ था। उस समय ओम प्रकाश विमल और दिनेश टोप्नो कार्यपालक अभियंता पद पर पदस्थापित थे। अरविंद कुमार वर्मा सहायक अभियंता के पद पर पदस्थापित थे। इसके अलावा देव सहाय भगत जूनियर इंजीनियर थे। इन्हीं अभियंताओं की देखरेख में पुल का निर्माण कराया गया था। अरविंद कुमार वर्मा फिलहाल मुख्य अभियंता कार्यालय में टेक्निकल एडवाइजर हैं। सूत्रों का कहना है कि अभी भी यह कोशिश हो रही है कि दोषी अभियंताओं को बचा लिया जाए। सारा ठिकरा खूंटी पथ प्रमंडल में कार्यरत अभियंताओं पर थोप दिया जाए। यह कि वर्तमान अभियंताओं ने बरसात के समय पुल के पीलरों की सही देखभाल और रख-रखाव नहीं किया। इसी कारण पुल पानी के बहाव में गिर गया।
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कब बना था पुल और कितनी आयी थी लागत
लगभग 1.14 करोड़ की लागत से इस पुल का निर्माण कराया गया था। 2006 में पुल बनना प्रारंभ किया और 2009 में पूरा हो गया। लेकिन अगले 100 साल के लिए बनाया गया यह पुल 16 वर्षों में ही धंस गया।
खूंटी प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता ने गिनाए हैं पुल गिरने के चार कारण
बनई नदी पुल, पथ प्रमंडल खूंटी के अधीन आता है। खूंटी के कार्यपालक अभियंता रामेश्वर साह ने एक जुलाई को अधीक्षण अभियंता पथ अंचल रांची को एक रिपोर्ट सौंप दी थी। उसमें पुल के पीलर धंसने के स्पष्ट रूप से चार प्रमुख कारण गिनाए थे। जांच रिपोर्ट में साह ने स्पष्ट लिखा है कि तत्कालीन अभियंताओं के कारण ही पुल गिरा। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में पुल गिरने के पांच प्रमुख कारण गिनाए थे।
1-कहा गया है कि एप्रुवल ड्राइंग में दिए गए डायरेक्शन के नोट के क्रम संख्या 18 में यह वर्णन है कि परमानेंट स्टील लाइनर शैल बी प्रोवाइडेड इन पायर पीलर अप टू स्कॉर लेवल। पर एमबी और स्थल अवलोकन से स्पष्ट है कि किसी भी प्रकार का स्टील लाइनर का उपयोग नहीं किया गया।
2-मापी पुस्त संख्या 1265 पृष्ठ संक्या 26 एवं 32 में पेडेस्टल का रेनफोर्समेंट दर्ज है। परंतु पेडेस्टल का कास्टिंग कहीं भी मापी पुस्तिका में दर्ज नहीं है।
3-स्वीकृत ड्राइंग के अनुसार पीलर वन एवं पीलर टू के सभी पाइल्स का टोटल पाइल डेप्थ 152 मीटर होना चाहिए। मापी पुस्त संख्या 1265, पृष्ठ संख्या 7, 12,18 एवं 23 में टोटल पाइल डेप्थ की मापी 119 मीटर ही दर्ज है।
4-पुल के एक स्पैन गिरने से पूर्व यातायात का परिचालन सुचारू रूप से जारी था। भारी बरसात में अचानक पीलर-1 का पाइल फाउंडेशन सेट्ल हो गया जिस कारण पाइल कैप एवं सब स्ट्रक्चर टिल्ट हो गया। फलस्वरूप सुपर स्ट्रक्चर(गिरडर-स्लैब) अपने मूल स्थान से डिसप्लेस होकर नीचे गिर गया। पुल निर्माण की गुणवत्ता प्रारंभ से ही उच्च कोटि की संभावित प्रतीत नहीं होती है। इसके कारण आरसीसी एम 30 ग्रेड कंक्रीट क्षतिग्रस्त हुआ है। पाइल हेड में डर्टी कंक्रीट को हटाए बिना पाइल कैप की ढलाई हुई है, जिसके कारण तेज बहाव में डर्टी कंक्रीट के बह जाने से रेनफोर्समेंट एक्सपोज हो गया।इस कारण पाइल कैप एवं सब स्ट्रक्चर एक तरफ झुक गया है जो कि स्टील येइल्डिंग के कारण हुआ है। ब्रिज के दोनों तरफ फ्लोर में बोल्डर से रिप-रैप किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि निर्माण के उपरांत भी सिंकिंग देखा गया होगा। चुकि यह फ्लोर प्रोटेक्शन का उपाय है, इसलिए स्थल देखने से प्रतीत होता है कि इसका प्राक्कलन में भी प्रावधान नहीं था।
5-अंत में यह भी कहा गया है कि पूर्व के कार्यपालक अभियंता द्वारा सीडीओ के मुख्य अभियंता को पत्र के माध्यम से सूचित किया गया था कि पुल का एक पेडस्टल आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त है। इससे गुणवत्ता पर सवाल उठना जायज है।
