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विधेयक के कड़े प्रावधानों से छोटे व मध्यम कोचिंग संस्थान लगे हैं मुरझाने, लग सकते हैं ताले

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द फॉलोअप डेस्क
राज्य में संचालित कोचिंग संस्थानों के लिए पिछले दिनों 26 अगस्त को विधानसभा से झारखंड कोचिंग सेंटर (नियंत्रण एवं विनियमन) विधेयक 2025 पारित किया गया है। छात्र, अभिभावक और कुछ हद तक कोचिंग संस्थानों के लिए भी यह हितकर है। लेकिन विधेयक के कुछ कड़े प्रावधानों से मध्यम एवं छोटे छोटे कोचिंग संस्थान परेशान हो उठे हैं। बिहार, राजस्थान व पड़ोसी राज्यों की तुलना में रजिस्ट्रेशन शुल्क, रजिस्ट्रेशन के डोक्युमेंटेशन, दंड व अन्य शर्तें काफी पेंचिदा और अधिक होने के कारण 100-50  बच्चों को पढ़ानेवाले कोचिंग संस्थानों के लिए आफत का रूप ले सकती है। मालूम हो 50 छात्रों से अधिक संख्या वाले कोचिंग संस्थान पर नियंत्रण के लिए यह नया कानून प्रभावी होगा।


कोचिंग संस्थानों की मूल परेशानी
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि अगर एक जिले में किसी कोचिंग संस्थान के तीन या चार ब्रांच हैं तो उसे प्रत्येक ब्रांच के लिए पांच-पांच लाख रुपए का शुल्क जमा करने की बाध्यता है। इस तरह छोटे छोटे कोचिंग संस्थान जहां 50 से लेकर 100,150 बच्चे पढ़ते हैं, उनके लिए इतनी बड़ी राशि जमा करना बहुत मुश्किल होने वाला है। दूसरी परेशानी दंड को लेकर है। खास कर छोटे और मध्यम कोचिंग संस्थानों के लिए। ये इस कारण से बहुत ही आतंकित और परेशान है कि किसी अन्य के कारण अगर कोई व्यवधान या नियमों का उल्लंघन होता है तो इसके लिए भी उन्हें दंडित होना पड़ेगा। पहली बार दंड के रूप में पांच लाख और दूसरी बार के लिए 10 लाख रुपए की राशि निर्धारित की गयी है। तीसरी बार में उनका रजिस्ट्रेशन ही रद्द करने का प्रावधान है। जबकि पड़ोसी राज्यों में यह राशि काफी कम है—बिहार में ₹25,000 और उत्तर प्रदेश में ₹50,000। विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड का दंड अनुपातिक दृष्टि से काफी अधिक है।

झारखंड में कोचिंग सेंटर खोलने के लिए ₹5,00,000 की बैंक गारंटी अनिवार्य की गई है। जबकि राजस्थान और बिहार जैसे राज्यों में बैंक गारंटी की कोई बाध्यता नहीं है। यह प्रावधान छोटे और मध्यम स्तर के कोचिंग सेंटरों पर सीधा आर्थिक बोझ डालता है और उनके बंद होने का खतरा बढ़ा सकता है। कोचिंग संस्थानों की प्रत्येक शाखा के लिए अलग पंजीकरण शुल्क अनिवार्य किया गया है। वहीं, बिहार में एक जिले में केवल एक पंजीकरण ही पर्याप्त है। इससे झारखंड में संस्थानों पर प्रशासनिक बोझ और खर्च बढ़ने की पूरी संभावना है। झारखंड के विधेयक में न्यूनतम क्षेत्रफल, सुविधाओं और शिक्षक योग्यता संबंधी कठोर प्रावधान किए गए हैं। अन्य राज्यों में इस संबंध में यूजीसी, एनसीईआरटी या स्थानीय दिशा-निर्देशों का पालन किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, झारखंड के मानक केंद्रीय दिशानिर्देशों से भी अधिक कठोर हैं, जिससे अनावश्यक बाधाएँ उत्पन्न होंगी।

कोचिंग संस्थान के जानकारों का मानना है
अधिनियम में अधिकारियों को बिना किसी समीक्षा तंत्र के अत्यधिक अधिकार दिए गए हैं। अन्य राज्यों में ऐसे अधिकारों का संतुलन अपीलीय या समीक्षा तंत्र द्वारा किया जाता है। झारखंड में इस व्यवस्था की अनुपस्थिति से मनमाने फैसले और भ्रष्टाचार का खतरा बढ़ सकता है।

झारखंड में नियामक या सलाहकार निकायों में कोचिंग एसोसिएशनों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जबकि राजस्थान और मध्यप्रदेश में निजी क्षेत्र या हितधारकों को बोर्ड में शामिल किया जाता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस तरह की अनुपस्थिति नीति निर्माण को कमजोर और एकतरफा बना सकती है।

कानून में समिति द्वारा लिए गए फैसलों के खिलाफ अपील करने का कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट, अधिकांश राज्यों में अपीलीय निकाय या विभागीय समीक्षा प्रक्रिया उपलब्ध है। इससे झारखंड में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर प्रश्नचिह्न खड़ा हो जाता है।

इस तरह के नकारात्मक प्रभाव से झारखंड में कोचिंग का बढ़ता दायरा ठिठक सकता है। इसका असर यहां के बच्चों पर भी पड़ने की संभावना है। बच्चे दूसरे राज्यों में जाने या कॉरपोरेट कोचिंग संस्थानों को ऊंची फीस देने को बाध्य हो सकते हैं।

विधेयक में ऑन लाइन कोचिंग संस्थानों के बारे में कोई जिक्र नहीं है। उन पर नियंत्रण का कोई प्रावधान नहीं किया गया है। इसलिए ऑफ लाइन कोचिंग संस्थान बुरी तरह प्रभावित हो सकते हैं।


 

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