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उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन की मांग को लेकर झारखंड के मंत्री इरफान अंसारी ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र

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रांची:

झारखंड के स्वास्थय मंत्री डॉ. इरफान अंसारी ने उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू को एक पत्र लिखा है। इस पत्र में उन्होंने उत्तर प्रदेश में अल्पसंख्यकों और उलेमाओं के साथ कथित हिंसा और अपमान की घटनाओं पर चिंता जताई है। हाल ही में सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो का उल्लेख करते हुए दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। बता दें कि इरफान अंसारी ने पत्र में लिखा कि  "एक पुत्र आज अत्यंत पीड़ा और आक्रोश के साथ आपको यह पत्र लिख रहा है। बचपन से हमने पढ़ा और समझा कि भारत का संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है—धर्म, जाति, भाषा या विचारधारा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा। राष्ट्रपति इस राष्ट्र की सर्वोच्च संवैधानिक संरक्षक होती हैं, जो हर नागरिक को समान दृष्टि से देखती हैं। किन्तु आज जो दृश्य सामने आ रहे हैं, वे इस मूल भावना को गहराई से आहत कर रहे हैं। विशेषकर उत्तर प्रदेश से लगातार ऐसी घटनाएँ सामने आ रही हैं, जिनमें मुस्लिम समाज के लोगों—विशेषकर उलेमाओं—का सरेआम अपमान, मारपीट और धार्मिक आधार पर प्रताड़ना दिखाई दे रही है। हाल ही में एक वीडियो में तथाकथित बजरंग दल से जुड़े व्यक्ति अक्षय ठाकुर द्वारा धार्मिक भेदभाव के आधार पर अमानवीय हिंसा और सार्वजनिक बेइज्जती का दृश्य अत्यंत चिंताजनक है। यह केवल कुछ व्यक्तियों पर हमला नहीं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और संवैधानिक मूल्यों पर सीधा प्रहार है।"

 उन्होंने राष्ट्रपति से सवाल करते हुए  पूछा कि  "महोदया, क्या इस देश में मुसलमान होना अपराध बनता जा रहा है?"
क्या “सबका साथ, सबका विकास” केवल एक राजनीतिक नारा रह गया है?
क्या किसी राज्य सरकार को यह अधिकार है कि वह एक विशेष समुदाय को भय और असुरक्षा में जीने को विवश कर दे?
यदि किसी राज्य में खुलेआम भीड़ हिंसा हो, धर्म के आधार पर अपमान किया जाए और दोषियों पर त्वरित व कठोर कार्रवाई न हो—तो यह स्पष्ट रूप से कानून-व्यवस्था की विफलता का संकेत है।

माननीय महोदया, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्य योगी नाथ के नेतृत्व वाली सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठ रहे हैं। यह सरकार नहीं बल्कि जात-पात का पाठशाला खोल रखे हैं। और उसी की कमाई से सरकार चला रहे हैं। इसकी कार्यशैली से झारखंड उत्तर बिहार बंगाल भारी आक्रोश है।यदि शासन निष्पक्ष दिखाई नहीं देता, यदि पीड़ितों को न्याय का भरोसा नहीं मिलता, यदि अल्पसंख्यकों में भय का वातावरण व्याप्त हो—तो यह लोकतंत्र के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति है।

रमजान जैसे पवित्र महीने में भी यदि मुसलमान स्वयं को असुरक्षित महसूस करें, तो यह केवल एक समुदाय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा पर लगा घाव है। मध्यप्रदेश, असम, महाराष्ट्र सहित कई राज्यों से भी अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं। यह प्रवृत्ति यदि नहीं रुकी, तो देश की एकता और अखंडता पर गहरा असर पड़ेगा।

 

उन्होंने आगे लिखा कि  "भारत विश्व में एक लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी राष्ट्र के रूप में जाना जाता है। “अल्लाह, ईश्वर तेरो नाम” की भावना हमारी साझा विरासत है। यदि कुछ तत्व नफरत और विभाजन की राजनीति कर रहे हैं, तो उसे रोकना हमारी संवैधानिक संस्थाओं का दायित्व है।

अतः आपसे विनम्र किन्तु दृढ़ आग्रह है कि—
1.उत्तर प्रदेश की वर्तमान कानून-व्यवस्था की स्थिति पर तत्काल संज्ञान लिया जाए।

2.राज्य सरकार से विस्तृत एवं सार्वजनिक रिपोर्ट तलब की जाए।

3.यदि संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन पाया जाए, तो कठोर संवैधानिक कदम उठाए जाएँ, जिसमें उत्तर प्रदेश में शीघ्र राष्ट्रपति शासन लगाने पर भी गंभीरता से विचार किया जाए।

महोदया, यह किसी दल विशेष के विरोध का विषय नहीं है—यह संविधान, न्याय, समानता और भारत की आत्मा की रक्षा का प्रश्न है।
यदि आज भी हम मौन रहे, तो इतिहास हमें क्षमा नहीं करेगा। आप झारखंड में रही हैं और झारखंड की संस्कृति यहां का अपनापन लोगों की मिठासियां की खूबसूरती से आप बखूबी वाकिफ हैं। देश में शांति, सद्भाव और न्याय की पुनर्स्थापना हेतु आपके त्वरित हस्तक्षेप की अपेक्षा है।"

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