पूर्वी सिंहभूम
पूर्वी सिंहभूम जिले के धालभूमगढ़ में प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट निर्माण को लेकर बड़ी प्रगति सामने आई है। लंबे समय से परियोजना में बाधा बनी करीब 9 एकड़ विवादित भूमि को नये प्रस्ताव से बाहर कर दिया गया है, जिससे निर्माण का रास्ता काफी हद तक साफ हो गया है। पहले यह एयरपोर्ट करीब 249 एकड़ जमीन पर प्रस्तावित था, लेकिन अब संशोधित योजना के तहत इसे 240 एकड़ वनभूमि पर विकसित किया जायेगा। नये प्रस्ताव में देवशोल मौजा की 8.21 एकड़ और रुआशोल मौजा की 0.21 एकड़ जमीन को हटा दिया गया है। यही वे क्षेत्र थे, जहां ग्राम सभाओं के विरोध और अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिलने के कारण परियोजना वर्षों से अटकी हुई थी।
संशोधित प्रस्ताव के बाद शनिवार को एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) की एक उच्चस्तरीय टीम ने धालभूमगढ़ का दौरा किया। झारखंड निदेशक अजय कुमार सिंह के नेतृत्व में टीम ने पुराने रनवे और आसपास के क्षेत्रों का निरीक्षण किया। इस दौरान रनवे की लंबाई-चौड़ाई, नेशनल हाईवे और रेलवे स्टेशन से दूरी सहित सभी तकनीकी पहलुओं का बारीकी से आकलन किया गया।

केंद्र को 24 अप्रैल को भेजी जायेगी रिपोर्ट
निरीक्षण के बाद टीम ने स्थानीय प्रशासन के साथ बैठक कर आगे की रणनीति पर चर्चा की। अधिकारियों के अनुसार, इस सर्वे के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर 24 अप्रैल को केंद्र सरकार को भेजी जायेगी, जिसके बाद अंतिम निर्णय लिया जायेगा। इसी क्रम में एएआई की टीम ने चाकुलिया हवाई पट्टी का भी निरीक्षण किया, जिससे इस परियोजना का एक समानांतर विकल्प भी उभरकर सामने आया है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्मित यह एरोड्रम आजादी के बाद से निष्क्रिय पड़ा है। करीब 515 एकड़ में फैली इस हवाई पट्टी का टीम ने विस्तृत सर्वे किया। रनवे की मौजूदा स्थिति, सुरक्षा मानकों और संरचनात्मक मजबूती का आकलन किया गया। साथ ही यह भी देखा गया कि वर्तमान परिस्थितियों में यहां विमान उतारे जा सकते हैं या नहीं। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि फिलहाल प्राथमिकता हवाई पट्टियों की सुरक्षा और संरक्षा सुनिश्चित करने की है, ताकि भविष्य में किसी भी संभावित दुर्घटना से बचा जा सके।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार वर्ष 2036 तक देश में 100 नये एयरपोर्ट विकसित करने की योजना पर काम कर रही है। इसी योजना के तहत पुराने और निष्क्रिय एरोड्रमों को पुनर्जीवित करने की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं, जिसमें चाकुलिया को एक संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है।

चाकुलिया एक वैकल्पिक एयरपोर्ट के रूप में उभर सकता है
ऐसे में यदि धालभूमगढ़ परियोजना किसी कारणवश आगे नहीं बढ़ती है, तो चाकुलिया एक वैकल्पिक एयरपोर्ट के रूप में उभर सकता है। यही वजह है कि दोनों स्थानों पर समानांतर रूप से सर्वे और तकनीकी मूल्यांकन किया जा रहा है। भूमि अधिग्रहण की स्थिति पर नजर डालें तो विभिन्न पंचायतों में बड़ी मात्रा में जमीन पहले ही अधिग्रहित की जा चुकी है, जिससे परियोजना के पहले चरण के शुरू होने की संभावनाएं मजबूत हुई हैं। पहले चरण में 240 एकड़ भूमि पर 1745 मीटर लंबा रनवे तैयार किया जायेगा, जो ATR-72 जैसे विमानों के लिए उपयुक्त होगा। इसके साथ ही टर्मिनल बिल्डिंग, एटीसी टावर और फायर स्टेशन का निर्माण किया जायेगा।
वहीं, दूसरे चरण में 554 एकड़ अतिरिक्त भूमि अधिग्रहित कर रनवे को 4400 मीटर तक विस्तारित करने की योजना है, ताकि बड़े विमान भी यहां उतर सकें और इसे पूर्ण विकसित एयरपोर्ट का स्वरूप दिया जा सके।
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2019 में हुई थी परियोजना की शुरुआत
गौरतलब है कि इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2019 में हुई थी, लेकिन वन भूमि, एलिफेंट कॉरिडोर और ग्राम सभाओं के विरोध के कारण निर्माण कार्य अब तक शुरू नहीं हो पाया। अब विवादित जमीन को हटाकर नये सिरे से प्रस्ताव तैयार किये जाने के बाद एक बार फिर परियोजना में तेजी की उम्मीद जगी है। कोल्हान क्षेत्र में फिलहाल एक भी एयरपोर्ट नहीं है। ऐसे में धालभूमगढ़ और चाकुलिया दोनों ही इस पूरे क्षेत्र के औद्योगिक, आर्थिक और कनेक्टिविटी विकास के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। अब सभी की नजर 24 अप्रैल पर टिकी है, जब सर्वे रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंपी जायेगी। इसके बाद यह तय होगा कि कोल्हान को उसकी पहली हवाई उड़ान धालभूमगढ़ से मिलेगी या चाकुलिया से।
