द फॉलोअप डेस्क
झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को लेकर सत्ताधारी दलों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी दल जनता को बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। चंपई के अनुसार, इस संशोधन के लागू होने के बाद भी राज्य सरकार को मिलने वाली रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम, डीएमएफटी फंड और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण ट्रस्ट से होने वाली हजारों करोड़ रुपये की आय में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
अवैध खनन धंधे को बचाने का आरोप
सोरेन ने सवाल किया कि फिर यह हंगामा किस बात का है? उनका आरोप है कि पूरा बवाल कोयले और लोहे के अवैध धंधे को चालू रखने के लिए है। इससे सरकार को एक रुपये का भी राजस्व नहीं मिलता, लेकिन सत्ता से जुड़े कुछ खास लोगों को हर साल हजारों करोड़ रुपये मिलते हैं। उन्होंने एक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि सीएम के करीबियों पर ईडी ने चार्जशीट भी दायर की है।.jpeg)
सेस की वजह से बढ़ी कीमतें और घटा उत्पादन
पूर्व मुख्यमंत्री ने बताया कि झारखंड में कोयले पर 450 रुपये प्रति टन और लौह अयस्क पर 600 रुपये प्रति टन सेस लगाया गया है। इसकी वजह से यहां कीमतें ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से काफी ज्यादा हो गई हैं। थर्मल कोयले की कीमत झारखंड में लगभग 2459 रुपये प्रति टन है, जबकि ओडिशा में 1708 रुपये और पश्चिम बंगाल में 1741 रुपये प्रति टन है। इससे कंपनियां प्रभावित हो रही हैं और अंततः बिजली तथा लोहे के उत्पाद महंगे होकर जनता पर बोझ बढ़ रहा है। उन्होंने आंकड़ों का हवाला देते हुए सोरेन ने कहा कि सेस लगाने के बाद झारखंड में कोयला और लौह अयस्क का उत्पादन 12-15 प्रतिशत तक घट गया है। बीसीसीएल के उत्पादन में लगभग 5 मिलियन टन की गिरावट आई और मुनाफे में भारी कमी हुई। सीसीएल का उत्पादन लक्ष्य से कम रहा तथा मुनाफा 27 प्रतिशत घटा। ईसीएल को 966 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। खपत घटी नहीं, इसलिए फायदा अवैध कारोबारियों को मिला, जिन्हें रॉयल्टी, डीएमएफटी, जीएसटी या सेस नहीं देना पड़ता।.jpeg)
बीसीसीएल एमडी पर फर्जी एफआईआर का जिक्र
सोरेन ने आरोप लगाया कि जब बीसीसीएल ने केंद्रीय बलों की मदद से अवैध खनन रोकने की कोशिश की, तो उसके एमडी के खिलाफ एक के बाद एक फर्जी एफआईआर दर्ज करवाए गए। उन्होंने कहा कि यह सरकारी संरक्षण में चल रहे खनन माफिया के अवैध कारोबार को रोकने की कोशिश का नतीजा था।
केंद्र सरकार के समय में राजस्व वृद्धि का दावा
पूर्व मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि 2014 में केंद्र में एनडीए सरकार आने के बाद राज्यों की माइनिंग से होने वाली आय में 354 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्तमान में राज्यों को खनन क्षेत्र से प्राप्त कुल राजस्व का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा मिलता है और इस संशोधन बिल के बाद भी यही स्थिति बनी रहेगी। उन्होंने 16,000 या 22,000 करोड़ रुपये के नुकसान की कहानियों पर सवाल उठाया और कहा कि पिछले वित्त वर्ष में सेस से कुल रकम सिर्फ 7486 करोड़ रुपये रही। उत्पादन लगातार घट रहा है, तो यह रकम कैसे 3-4 गुना हो जाएगी?.jpeg)
रोजगार पर असर और नई खदानों की अनदेखी
सोरेन के अनुसार, सेस की वजह से कोल्हान के बड़ाजामदा समेत कई क्षेत्रों में खदानें बंद हो रही हैं और आयरन क्रशरों पर ताले लग रहे हैं, जिससे हजारों लोगों का रोजगार छिन रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का ध्यान भूमिपुत्रों के रोजगार पर नहीं, बल्कि अवैध कारोबारियों को संरक्षण देने पर है। उन्होंने ओडिशा का उदाहरण दिया कि वहां सिर्फ 35 नीलाम खनिज ब्लॉक चालू करके लगभग 87,000 करोड़ रुपये ऑक्शन प्रीमियम कमाया गया। ओडिशा का वार्षिक खनन राजस्व 2019-20 के 13,700 करोड़ रुपये से बढ़कर औसतन 45,000-50,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष हो गया। वहीं झारखंड सरकार केंद्र की स्वीकृति के बावजूद नई खदानें शुरू करने में रुचि नहीं दिखा रही। राज्य का खनन राजस्व 2020-21 के लगभग 7500 करोड़ रुपये से 2024-25 में लगभग 11,900 करोड़ रुपये के स्तर पर ही अटका हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
अंत में चंपई सोरेन ने कहा कि राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट फिर से पढ़ना चाहिए, जिसमें स्पष्ट लिखा है कि संसद कानून बनाकर राज्य द्वारा सेस वसूलने की शक्ति को सीमित या बंद कर सकती है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर राज्य सरकार चाहे तो ओडिशा की तर्ज पर सभी स्वीकृत खदानों की नीलामी कर खनन राजस्व को कई गुना बढ़ा सकती है। लेकिन वह रकम सरकारी खजाने में जाएगी, न कि खनन माफिया की जेब में।