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सचिवालय का सच : काले अलकतरे से काली कमाई

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जीतेंद्र कुमार

सचिवालय का यह सच जगजाहिर है कि हमारे वरीय नौकरशाह कार्य विभागों में जाने को बेताब रहते हैं। इसके लिए हर तरह का जुगाड़ लगाते हैं। अपने को समझौते की शर्तों में भी बांधते हैं। कार्य विभागों में जाने की यह बेचैनी क्यों, यह सभी जानते हैं। कुछ बातें कही नहीं जाती, इसीलिए यहां भी नहीं लिखी जा रही है। हाल में एक साहब इतने व्याकुल रहे कि उनकी यह व्याकुलता ही निगेटिव बन गयी। पढ़ने-लिखने के माहिर इस साहब को प्रशिक्षण की जिम्मेदारी दे दी गयी। कुछ और भी साहब हैं जो कार्य विभागों से ही चिपके हैं। सरकार भी उन्हें चिपकाए हुए है। दोष और लालच केवल साहब का नहीं है। चिपकने और चिपकाने के कई और भी कारण हैं।


यहां एक आदेश का जिक्र करना यथोचित होगा। 2021 में तत्कालीन मुख्य सचिव सुखदेव सिंह ग्रामीण कार्य विभाग की समीक्षा कर रहे थे। उस क्रम में उन्होंने ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा बनाए जानेवाली सड़कों, पुल और पुलियों का डाटाबेस (एमआईएस) तैयार करने का निर्देश दिया था। उस आदेश में चीफ सेक्रेट्री ने कहा था कि राज्य गठन (वर्ष 2000) के बाद विभाग द्वारा बनायी गयी सड़क, पुल और पुलियों का विभाग डाटा बेस तैयार करे। इससे पूर्व तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास ने भी पथ निर्माण विभाग और नगर विकास विभाग को सड़कों का डाटा बेस तैयार करने का आदेश दिया था। लेकिन राज्य के किसी भी कार्य विभाग ने वर्ष 2000 के बाद बने पुल-पुलियों, सड़कों, भवनों का डाटाबेस तैयार नहीं किया।


अब सवाल उठता है कि एमआईएस। इसमें यह देखा जा सकता है कि झारखंड में कौन सी सड़क पथ निर्माण विभाग की, कौन सी सड़क ग्रामीण कार्य विभाग की, कौन सी सड़क नगर निगम या जिला परिषदों की है। किस सड़क का निर्माण कब और कितनी लागत से हुआ। सड़क निर्माण के समय अभियंता कौन थे। अभियंताओं ने सडक की कितनी लाइफ दी थी। यह डाटा बेस उपलब्ध रहने पर राज्य का कोई भी नागरिक और सरकार में बैठे आलाधिकारी, मंत्री और विधायक भी एक क्लिक में यह जान सकते हैं कि किस सड़क का कब निर्माण हुआ। उसका लाइफ क्या था और आज उसकी स्थिति क्या है। अगर कोई सड़कक 2024 में बनी है तो फिर उसे 2025 में तो नहीं बनाया जा रहा है। इतना ही नहीं योजनाओं के कार्यान्वयन की दृष्टि से भी यह सरकार के लिए सुविधाजनक स्थिति होगी। जिससे बनी हुई सड़क को फिर से बनाने के खेल पर रोक लगाना उसके लिए बहुत आसान हो जाएगा। 2030 तक के लिए बनायी गयी किसी  सड़क के 2025 में ही टूट जाने, उस पर गड्ढा हो जाने पर संबंधित दोषी अभियंताओं का चिन्हितीकरण भी आसान हो जाएगा। उसके विरुद्ध कार्रवाई करना पारदर्शी और नियमानुसार कहलाएगा।


उदाहरण के रूप में, इस आंकड़े के उपलब्ध नहीं होने के कारण ही, आप एक क्लिक में नहीं जान सकते कि राजधानी रांची के बिरसा चौक से प्रोजेक्ट भवन या धुर्वा गोलचक्कर तक, राज्य गठन के बाद कितनी बार सड़कें बनायी गयी। फिर जब बनी हुई सड़कें ही बार बार बनायी जाएंगी तो उसके अलकतरे से निकलने वाली काली कमाई कहां कहां जाएगी, इसे समझने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। बिरसा चौक से प्रोजेक्ट भवन या गोलचक्कर तक की सड़क एक उदाहरण मात्र है। राज्य में ऐसी हजारों सड़कें है। खास कर निकायों में, जहां मुहल्ले की एक ही सड़क को साल में दो बार बनाया जा रहा है। सड़कें बनने के साथ ही छह महीने में टूट जा रही है। उसमें गड्ढे हो जा रहे हैं।

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