द फॉलोअप डेस्क
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्वागत करते हुए कहा है कि केवल कागज पर सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने का कोई लाभ नहीं दिखता है। उन्होंने कहा कि साल का एशिया का सबसे पड़े इस वन क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने से पहले वन, वन्य जीव और आम नागरिकों के हितों का समानरूप से ख्याल करना होगा। संभावित आशंकाओं को दूर करना होगा। उस क्षेत्र में रहनेवाले लोगों की आजीविका नहीं छिनी जाएगी, उनमें यह विश्वास पैदा करना होगा। इसके लिए सारंडा वन क्षेत्र की सुरक्षा के लिए मानव संसाधन विकसित करना होगा। उस क्षेत्र में कानून व्यवस्था दुरुस्त हो, इसकी व्यवस्था करनी होगी। पुलिस पीकेट की स्थापना करनी होगी। अन्यथा कागज पर सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने का लाभ न तो वन, वन्य प्राणी और उस क्षेत्र में रहनेवाले लोगों को ही मिल सकेगा। सारंडा पर सुप्रीम कोर्ट में हुई आज की सुनवाई के बाद राधाकृष्ण किशोर अपने कार्यालय कक्ष में मीडियाकर्मियों से बातचीत कर रहे थे।

राज्य सरकार की अनुमति के बगैर सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर कर दिया गया
वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने कहा कि लगातार खबरें आ रही है कि सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर किया गया। जिसके आलोक में सुप्रीम कोर्ट ने आठ अक्तूबर तक वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने का आदेश दिया। लेकिन उनकी जानकारी में वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्युट ऑफ इंडिया ने यह सिफारिश की थी कि सारंडा के 5700 हेक्टेयर वन क्षेत्र को वाइल्ड लाइफ संचुरी घोषित किया जाए। उसी सिफारिश के आलोक में तत्कालीन पीसीसीएफ के निर्देश पर वन प्रमंडल पदाधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट में 2 दिसंबर 2024 को पहला शपथ पत्र दायर किया। दूसरी बार 29 अप्रैल 2025 को सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर किया गया। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान वन एवं पर्यावरण सचिव उपस्थित थे। कोर्ट को यह बताया गया कि वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने का मामला प्रक्रियाधीन है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीच्युट ऑफ इंडिया को प्रस्ताव भेजा गया है। लेकिन यहां यह समझना जरूरी है किक पीसीसीएफ सरकार नहीं होते। सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दायर करने से पहले मुख्य सचिव या कैबिनेट का अनुमोदन जरूरी होता है। इसलिए सेंचुरी घोषित करने से पहले उस क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक प्रभाव का अध्ययन जरूरी हो जाता है। इसीलिए मुख्यमंत्री ने स्थल निरीक्षण कर अध्ययन के लिए पांच मंत्रियों की समिति का गठन किया। मंत्रियों का समूह रोआम और अन्य क्षेत्रों में गया। रोआम में 50 गावों के लोग इस तरह तीर-धनुष लेकर मंत्रियों के पास पहुंचे। उनका कहना था कि वे जीव जंतुओं की रक्षा के लिए तो आए हैं पर मानव जीवन की रक्षा कौन करेगा। उनका तर्क था कि वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित करने से पहले ग्राम पंचायतों की भी राय नहीं ली गयी। न्यायपालिका और सरकार अगर सेंचुरी घोषित करती है तो हम निर्वासित हो जाएंगे। हमारी रक्षा कौन करेगा, जबकि हम इसी परिवेश में जीने के आदि हैं।
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आर्थिक प्रभाव का बुरा असर होगा
वित्त मंत्री ने कहा कि सारंडा जहां वन संपदाओं से परिपूर्ण है वहीं लौह अयस्क का वहां अकूत भंडार है। चिरिया, गुआ, किरिबुरु के आयरन ओर माइंस देश को स्टील उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देता है। वहां का आयरन ओर बोकारो, टाटा जैसी कंपनियों को आपूर्ति की जाती है। प्रति वर्ष लगभग 24 मिलियन टन लौह अयस्क का उत्खनन होता है। सेंचुरी घोषित किए जाने से झारखंड को लगभग 2500 करोड़ रुपए का राजस्व नुकसान का अनुमान है। उन्होंने कहा कि सारंडा वन का फैलाव लगभग 600 वर्ग किलोमीटर में है। इसका तीन भाग उड़ीसा की सीमा से लगता है। सारंडा वन क्षेत्र के गोलबांदा, धलकोबाद, तिरिलपोसी, करमपादा आदि क्षेत्रों ऐसे जंगली क्षेत्र हैं जो असुरक्षित हैं। इसकी सुरक्षा के लिए मानव संसाधन की जरुरत है। सारंडा वन प्रमंडल की सुरक्षा व संरक्षा के लिए 157 पद स्वीकृत हैं। लेकिन अभी 84 पद रिक्त हैं।

उड़ीसा लॉबी की भी भूमिका
इधर सारंडा को वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित कराने के पीछे उड़ीसा के आयरन ओर लॉबी की भी प्रभावी भूमिका बतायी जा रही है। जानकार सूत्रों का कहना है कि उड़ीसा का यह लॉबी चाहता है कि सारंडा वाइल्ड लाइफ सेंचुरी घोषित हो जाए ताकि उड़ीसा में आयरन ओर उत्खनन का दायरा बढ़े। इसका लाभ वहां की सरकार और आयरन ओर माइंस के मालिकों को मिले।
