खूंटी
आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जन्मभूमि उलिहातू, जो वर्षों से भीषण जल संकट से जूझ रही थी, अब जल आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो चुकी है। झारखंड आधारित स्टार्टअप Aqualine Bhuvanam द्वारा विकसित "पानी की खेती" तकनीक ने यहां जल क्रांति की नींव रख दी है।
खूंटी ज़िले के सबसे शुष्क क्षेत्रों में गिना जाने वाला उलिहातू गांव लंबे समय से जल संकट का सामना कर रहा था। गांव में 50 से अधिक बोरवेल और बिरसा मुंडा स्मृति परिसर के 15 बोरवेल पूरी तरह से सूख चुके थे। इसके चलते गांव के आम निवासियों के साथ-साथ स्कूल के छात्र, स्वास्थ्य केंद्र के मरीज और सुरक्षाबल भी पीने योग्य जल की कमी से जूझ रहे थे।
स्थानीय लोगों और भगवान बिरसा मुंडा के परिजनों ने गांव की इस समस्या को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक पहुँचाया था। इसके बाद जिला प्रशासन ने इस पर गंभीरता से संज्ञान लिया और समाधान की दिशा में ठोस पहल की।

झारखंड के स्थानीय स्टार्टअप Aqualine Bhungru / Bhuvanam, जिसकी स्थापना रथीन भद्र और राजा बागची ने की है, ने इस गंभीर संकट से निपटने के लिए "पानी की खेती" नामक तकनीक प्रस्तुत की। यह एक वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित स्थानीय भूजल पुनर्भरण तकनीक है, जिसमें पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक नवाचार का मेल शामिल है।
26 जून 2025 को खूंटी जिला प्रशासन, जल जीवन मिशन, अधीक्षण अभियंताओं और तकनीकी अधिकारियों के साथ एक संयुक्त स्थल निरीक्षण किया गया। इस निरीक्षण में यह पाया गया कि सभी जल संरचनाएं पूरी तरह कार्यशील हैं, जल की गुणवत्ता संतोषजनक है और स्थल पर लगाए गए स्मार्ट फिल्ट्रेशन सिस्टम, डीप ड्रिल रिचार्ज स्ट्रक्चर और ओवरहेड टैंक पूरी तरह सफल रहे हैं।
प्रमुख संरचनाओं में से एक Recharge Structure 1 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के सामने स्थापित किया गया है, जिसकी गहराई 820 फीट है। इसमें 20 फीट की केसिंग और 6x6x5 फीट का सोक पिट बनाया गया है जिसमें मल्टी लेयर फिल्टर सिस्टम लगाया गया है। दूसरा मुख्य संरचना Recharge Structure 3, SSB कैंप के समीप है जिसकी गहराई 840 फीट है। इसमें चारकोल और रेत पर आधारित फिल्टर सिस्टम के साथ 10x10x10 फीट का सोक पिट तैयार किया गया है। इन संरचनाओं के साथ एक 2 हॉर्सपावर का सबमर्सिबल पंप और 500 लीटर का ओवरहेड टैंक भी स्थापित किया गया है, जिससे पानी का संग्रहण और वितरण सुचारू रूप से हो रहा है।

इस पहल का लाभ गांव के विद्यालयों के छात्र और शिक्षक, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के मरीज और कर्मचारी, और SSB के जवानों को मिल रहा है। यह समाधान न केवल तकनीकी रूप से सफल रहा है, बल्कि स्थानीय जरूरतों के अनुसार अनुकूल और स्थायी भी सिद्ध हुआ है।
रथीन भद्र और राजा बागची द्वारा विकसित इस तकनीक को जिला प्रशासन ने एक प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण समाधान के रूप में मान्यता दी है। संयुक्त तकनीकी रिपोर्ट में इसे प्रशंसनीय बताया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यदि झारखंड जैसे राज्य के स्टार्टअप्स स्थानीय समस्याओं को समझते हुए नवाचार करें, तो वे राष्ट्रीय स्तर की चुनौतियों का भी समाधान बन सकते हैं। यह प्रयास केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि भगवान बिरसा मुंडा को समर्पित एक सच्ची और सार्थक श्रद्धांजलि है। यह पहल यह भी दिखाती है कि भारत के ग्रामीण क्षेत्र, यदि विज्ञान, स्थानीय भागीदारी और प्रशासनिक सहयोग से जुड़ें, तो वे जल आत्मनिर्भरता की दिशा में उल्लेखनीय कदम बढ़ा सकते हैं।
